सवर्ण आरक्षण के बाद ओबीसी आरक्षण को 54% करने की मांग
मोदी सरकार के सवर्ण जातियों के गरीब लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के फैसले के बाद कई पार्टियों की तरफ से अन्य वर्गों को मिलने वाले आरक्षण को बढ़ाने की मांग की जा रही है। इसमें एनडीए में उसकी एक सहयोगी पार्टी ने भी अन्य तबके के आरक्षण को विस्तार देने की मांग की है। अब बचे 90 फीसदी में से अन्य पिछ़ड़ा वर्ग (ओबीसी) 54 फीसदी आरक्षण की मांग उठ रही है। इस मांग के बाद एसी और भी मांगों का पिटारा खुल सकता है।

केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि ओबीसी को मिलने वाले 27 फीसदी आरक्षण को जनसंख्या के अनुपात में बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ओबीसी को शुरुआत में कम से कम 10 फीसदी ज्यादा आरक्षण दिया जा सकता है. रिपब्लिक पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के नेता ने कहा कि इसकी शुरुआत सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना, 2011 के ओबीसी अप्रकाशित डेटा को सार्वजनिक करके की जा सकती है।
साल 1980 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट में अनुमान लगा गया था कि साल 1931 की जनगणना के मुताबिक ओबीसी की जनसंख्या 50 प्रतिशत थी, जो कि ओबीसी की आखिरी जनगणना है। अठावले ने सुप्रीम कोर्ट के कुल आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा तय करने की तरफ ध्यान दिलाते हुए कहा कि ओबीसी कोटा 27 प्रतिशत तक सीमित है। अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए 22.5 प्रतिशत आरक्षण है। ऐसे में जब 50 प्रतिशत की सीमा नहीं लागू होती हो तो तो ओबीसी के कोटे को बढ़ाकर 37 फीसदी कर देना चाहिए।

वहीं समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने भी ये मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि जब सवर्ण जातियों के गरीबों को कोटा देने का फैसला केंद्र ने किया है तो ओबीसी कोटा को बढ़ाकर 54 प्रतिशत कर देना चाहिए। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति को जब जनसंख्या के आधार पर 22.5 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। जब सरकार ये लक्ष्मण रेखा पार कर रही है तो हमारी मांग है कि ओबीसी को भी जनसंख्या के अनुपात से 54 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए।












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