Rajendra Bharud : गर्भ में थे तब पिता की मौत, मां ने शराब बेचकर पढ़ाया, बेटा पहले IPS फिर बना IAS
नई दिल्ली। जो लोग कहते हैं कि उनकी कामयाबी की राह में परिवार की आर्थिक तंगी रोड़ा है। वो राजेन्द्र भारूड़ की जिंदगी से प्रेरणा ले सकते हैं। ये जब अपनी मां के गर्भ में थे तब पिता की मौत हो गई। तीन भाई-बहनों और मां के सिर पर रहने को पक्की छत तक नहीं थी। दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं। मजबूर मां ने शराब बेचना शुरू किया। शराब लेने के लिए आने वाले लोग स्नैक्स के बदले कुछ पैसे राजेन्द्र को दे दिया करते थे। उन्हीं पैसों से राजेन्द्र ने किताबें खरीदी और मन लगाकर पढ़ाई की। नतीजा यह है कि राजेन्द्र अब डॉ. राजेन्द्र भारूड़ आईएएस हैं।

आदिवासी समाज के पहले आईएएस राजेन्द्र भारूड़
डॉ. राजेन्द्र भारूड़ मूलरूप से महाराष्ट्र के धुले जिले के सामोडा के रहने वाले हैं। मुफलिसी में जन्मे और फिर आईएएस बनने का तक सफर तय करना आसान नहीं था। यह सब राजेन्द्र भारूड़ की मां की हिम्मत और खुद राजेन्द्र के बुलंद हौसलों के दम पर हो पाया है। महाराष्ट्र के आदिवासी भील समाज से आईएएस बनने वाले राजेन्द्र पहले शख्स हैं।

गन्ने की खरपतवार से बनी झोपड़ी में बीता बचपन
मीडिया से बातचीत में राजेन्द्र अपने संघर्ष की कहानी बयां करते हुए बताते हैं कि 'मैंने कभी पिता बंडू भारूड़ को नहीं देखा। परिवार की माली हालात इतनी खराब थी कि उनकी कोई फोटो भी नहीं थी। मैं पेट में था तब वे गुजर गए थे। मुझसे बड़ा एक भाई और एक बहन है। पिता की मौत के बाद समाज के लोग मेरी मां कमलाबाई से कहते थे कि गर्भपात करवा ले। तीसरी बच्चे को कैसे पाल सकेगी?, लेकिन मां ने मुझे जन्म दिया और जिंदा रखा। उस वक्त हमारे सिर पर पक्की छत नहीं थी। गन्ने की खरपतवार से बनी झोपड़ी थी'

मजदूरी से पेट नहीं भरा तो बेचने लगी शराब
पति की मौत के बाद तीन बच्चों को पालने की जिम्मेदारी कमलाबाई के कंधों पर आ गई थी। कमलाबाई मजदूरी करने लगी, मगर तब 10 रुपए प्रतिदिन मिलते थे। राजेन्द्र दो-तीन साल के थे तब मां कमलाबाई ने देसी शराब बेचनी शुरू कर दी। भूख से बिलखते राजेन्द्र को चुप करवाने के लिए मां व दादी अक्सर शराब की एक-दो बूंद पिला देती थी। ताकि चुपचाप भूखा ही सो जाए। इतनी मुफलिसी के बावजूद कमलाबाई ने राजेन्द्र का स्कूल में दाखिला करवाया।

शराबियों से स्नैक्स के बदले मिले पैसे से खरीदी किताबें
डॉ. राजेन्द्र भारूड़ बताते हैं कि वे अपनी झोपड़ी के पास स्थित एक चबूतरे पर बैठकर पढ़ाई किया करते थे। इसी दौरान मां से शराब लेने के लिए लोग आते थे। वे बच्चे राजेन्द्र से स्नैक्स व सोडा आदि मंगवाने का काम करते थे। बदले में कुछ पैसे दे देते। इन्हीं पैसों को जोड़कर राजेन्द्र किताबें खरीदते थे। यह सिलसिला कई साल तक चलता रहा। तमाम मुश्किल हालात के बावजूद राजेन्द्र मन लगाकर पढ़ाई करता रहा। बारहवीं कक्षा 90 प्रतिशत और दसवीं 95 प्रतिशत अंक से उत्तीर्ण की।

2011 में बने मेडिकल कॉलेज के बेस्ट स्टूडेंट
दसवीं और बारहवीं में अच्छे अंक हासिल करने के बाद राजेन्द्र ने मेडिकल प्रवेश का एग्जाम दिया। ओपन मेरिट के तहत मुंबई के सेठ जीएस मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिला। यहां भी राजेन्द्र की पढ़ाई लगन बनी रही। वर्ष 2011 में ये कॉलेज के बेस्ट स्टूडेंट चुने गए। उसी दौरान आईएएस बनने की दिशा में कदम बढ़ाया और यूपीएससी का फार्म भरा।

पहले प्रयास में पास की यूपीएससी
7 जनवरी 1988 को जन्मे राजेन्द्र भारूड़ ने पहले ही प्रयास में यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। पहली बार में ये आईपीएस बने, लेकिन राजेन्द्र का सपना आईएएस बनने का था। दूसरी बार फिर प्रयास किया और इस बार कलेक्टर बनने का ख्वाब पूरा हो गया। जब सामोडा में नेता और अफसर राजेन्द्र को बधाई देने आने लगे तब मां को पता चला कि उनका राजू (दुलार से) कलेक्टर की परीक्षा में पास हो गया। मां को तो यूपीएससी का मतलब भी पता नहीं था, मगर वह सिर्फ रोती रही और ये आंसू खुशी के थे। राजेन्द्र भारूड़ ने अपने जीवनी ये पहलू सपनों की उड़ान नामक की किताब में लिखे हैं।

जो लोग मारते थे ताने वो भी कर रहे गर्व
राजेन्द्र भारूड़ की किताब सपनों की उड़ान के मुताबिक मां को शराब बेचते और मुझे पढ़ते देख लोग अक्सर ताना मारा करते थे। वे मां कमलाबाई से कहते थे कि भील का लड़का है भील ही रहेगा और अपनी मां की तरह एक दिन यह भी शराब ही बेचेगा। वे ताने सुनकर मां ने तय कर लिया था कि बेटे का बड़ा असफर बनाऊंगी। बेटे जब यूपीएससी परीक्षा में पास हुआ तो वे ताना मारने वाले लोग ही गर्व करने लगे।

नंदूरबार के कलेक्टर हैं राजेन्द्र भारूड़
2013 बैच के आईएएस अफसर डॉ. राजेन्द्र भारूड़ वर्तमान में महाराष्ट्र के नंदूरबार के जिला कलेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले सोलापुर जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पद पर भी सेवाएं दे चुके हैं।
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