Civil Service Day 2022 : अंग्रेजों का गुरुर तोड़ IAS बनने वाले पहले भारतीय सत्येंद्रनाथ टैगोर की कहानी
नई दिल्ली, 21 अप्रैल। देश में आज राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस 2022 मनाया जा रहा है। लोक प्रशासन में विशिष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार मिलेंगे। यह दिवस भारतीय सिविल सेवा अधिकारियों के कार्य और प्रयासों को प्रेरित करने के उद्देश्य मनाया जाता है।

सत्येंद्रनाथ टैगोर की सक्सेस स्टोरी
राष्ट्रीय लोक सेवा दिवस के मौके आपको भारत के आईएएस अधिकारी सत्येंद्रनाथ टैगोर की संघर्ष व सक्सेस स्टोरी जरूर जाननी चाहिए। अंग्रेजों के जमाने में उच्च शिक्षा हासिल कर इस मुकाम तक पहुंचना आसाना नहीं था। तब आईएएस को ट्रेनिंग ही भारत नहीं बल्कि इंग्लैंड में मिलती थी।

रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे सत्येंद्रनाथ
दरअसल, ब्रिटिश राज में कलेक्टर-एसपी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर अंग्रेजों का ही चयन होता था। साल 1832 में भारतीयों के लिए मुंसिफ और सदर अमीन पद बनाए गए। फिर महत्वपूर्ण पदों पर भारतीयों को नियुक्त करना शुरू किया। पहले भारतीय आईएएस बनने का गौरव विश्वविख्यात कवि रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर (ICS) को मिला।

एक जून 1842 को कोलकाता में जन्मे सत्येंद्रनाथ टैगोर
अंग्रेजों का गुरुर तोड़कर आईएएस बनने वाले पहले भारतीय सत्येंद्रनाथ टैगोर का जन्म 1 जून 1842 को कोलकाता में हुआ था। इनकी शुरुआती शिक्षा भी कोलकाता से हुई। फिर सत्येंद्रनाथ प्रेसिडेंसी कॉलेज चले गए। इनकी शादी 1859 में ज्ञानंदिनी देवी से हुई थी।

1854 में लंदन में सिविल सर्विस कमीशन का गठन
भारत में राज कर रही ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सिविल सेवकों को चुनने की प्रकिया को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे, क्योंकि इसमें भारतीयों को बराबर मौका नहीं मिला था। इसलिए साल 1854 में लंदन में सिविल सर्विस कमीशन का गठन किया गया। भारत में अधिकारियों की नियुक्ति के लिए सिविल सर्विस की परीक्षा की शुरुआत हुई।

यूरोपीय क्लासिक के लिए ज्यादा नंबर
अंग्रेजों ने भले ही दुनिया को दिखाने के लिए सिविल सर्विस कमीशन का गठन कर दिया, लेकिन वह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि कोई भारतीय इस परीक्षा को पास करे। ऐसे में अंग्रेजों ने तय किया कि यह परीक्षा सिर्फ लंदन में होगी। ऐसे में हर किसी भारतीय के लिए लंदन पहुंचना मुमकिन नहीं था। दूसरा परीक्षा के सिलेबस को इस तरह से तैयार किया गया था कि भारतीयों के लिए परीक्षा पास करना मुश्किल थी। परीक्षा में यूरोपीय क्लासिक के लिए ज्यादा नंबर रखे गए।

लंदन में जाकर पास की परीक्षा
सिविल सर्विस कमीशन का गठन होने और परीक्षा शुरू होने पर लग रहा था कि कोई भारतीय इस परीक्षा को पास कर अंग्रेजों के जमाने में अफसर शायद ही बन पाए, मगर अंग्रेजों के इस गुरुर को सत्येंद्रनाथ टैगोर ने तोड़ा। उन्होंने साल 1863 में लंदन जाकर इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा पास की और फिर लंदन में ही ट्रेनिंग पूरी करके साल 1964 में भारत लौटे।

अहमदाबाद के कलेक्टर बने सत्येंद्रनाथ टैगोर
लोक सेवक के रूप में सत्येंद्रनाथ टैगोर की पहली नियुक्ति बांबे प्रेसिडेंसी में हुई। इसके बाद साल 1865 में सत्येंद्रनाथ अहमदाबाद के असिस्टेंट मजिस्ट्रेट और कलक्टर बनाए गए। साल 1882 में वे कर्नाटक के कारवार में जिला न्यायाधीश बने। साल 1897 में महाराष्ट्र के सतारा के न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

अब यूपीएससी करवाती सिविल सेवा परीक्षा
सत्येंद्रनाथ लगभग 30 सालों तक सत्येंद्रनाथ सिविल सर्विस में रहे। सेवानिवृत्त होने के बाद सत्येंद्रनाथ वापस कोलकाता लौट आए, जहाँ 9 जनवरी 1923 को उनका निधन हो गया। भारतीयों के लगातार प्रयास और याचिकाओं के बाद आखिरकार ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और सत्येंद्रनाथ की मौत से एक साल पहले 1922 से यह परीक्षा भारत में होने लगी, जो अब यूपीएससी आयोजित करवाती है।
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