'पिजंरे में बंद तोते' को आसानी ने आजाद नहीं करना चाहती सरकार

supreme court
नयी दिल्ली। देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट से 'पिंजड़े में बंद तोता' की उपमा पा चुके केंद्रीय जांच ब्यूरो को सरकार के चंगुल से आसानी से आजादी मिलती नजर नहीं आ रही है। सरकार आसानी से इसे आजादी देने के पक्ष में नहीं दिख रही है। सीबीआई की दलीलों को माने तो सरकार और प्रमुख राजनीतिक दल उसे अपने प्रभाव के अंदर रखना चाहती है। उसके कामों पर और उसकी स्वायत्ता पर अंकुश बनाए रखना चाहती है। कोयला घोटाले के सुनवाई के दौरान कोल ब्लॉक आंवटन की मुख्य फाइलों को कोयला मंत्री द्वारा छानबीन किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के काम के रवैये पर सवाल उठाते हुए पिजंरे में बंद तोता कहा था। सुप्रीम कोर्ट में अपने बेइज्जती होने के बाद से ही सीबीआई अपनी आजादी के लिए लड़ रही है।

देश की प्रमुख जांच एजेंसी ने सरकार से दो सुविधाएं प्रदान किए जाने की मांग अदालत में रखी, जिसका सरकार के वकील ने पुरजोर विरोध किया।सीबीआई ने कोयला ब्लॉक आवंटन मामले की सुनवाई कर रही सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के सामने अपनी दलील में कहा था कि उसके निदेशक को सरकार के सचिव के बराबर पदेन अधिकार निहित हो ताकि नौकराशाही के जाल में उलझे बगैर निदेशक कार्मिक मंत्रालय से सीधे संपर्क साध सकें। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को सरकार से सीबीआई की दलीलों पर अपना पक्ष रखने के लिए कहा।

अदालत ने सरकार से सीबीआई की उस दलील पर अपनी स्थिति साफ करने के लिए कहा, जिसमें एजेंसी ने अदालतों के सामने उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए स्वतंत्र वकील रखने का अधिकार जांच एजेंसी के निदेशक को दिए जाने की मांग की थी। सरकार की ओर से पैरवी करते हुए सोलिसीटर जनरल मोहन पराशरन ने सीबीआई की दोनों दलीलों का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा, "यह प्रशासनिक भावना के विरुद्ध होगा..इससे गलत संकेत जाएगा..इसमें शक्ति संतुलन बनाए रखा गया है। सीबीआई को ढेर सारी शक्तियां प्रदान की गई हैं।

ज्ञात हो कि इसी वर्ष मई महीने में कोयला ब्लॉक आवंटन मामले पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायाल ने अदालत में पेश होने से पहले स्थिति रिपोर्ट की मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा 'छानबीन' किए जाने पर नाराजगी जताई थी और सीबीआई को 'पिंजड़े में बंद तोता जो अपने मालिक की भाषा बोलता है' कहा था।

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