शीला की गलतियों से तैयार हुई 'आप' की सियासी जमीन

ये शीला दीक्षित के गलत फैसलों का ही नतीजा है कि दिल्ली में 15 सालों तक शासन करने वाली सरकार इस विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित हो गई। पिछली सरकार की गलतियों पर आप का हथियार चलने लगा है तो उन्हें लोगों ने भी समर्थन देना ही सही समझा। फिर चाहे 1984 के सिख विरोधी दंगों पर एसआइटी गठित करने की बात हो या फिर शीला दीक्षित के खिलाफ अनधिकृत कालोनी मामले और राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हुए भ्रष्टाचार पर मुकदमा दर्ज करवाने की बात या फिर डीम्स के खातों की सीएजी जांच की घोषणा। आम आदमी पार्टी के इन कदमों को हर स्तर पर जनता का साथ मिल रहा है।
अगर शीला दीक्षित सरकार के गलत फैसलों की बात करे तो इसकी लिस्ट बड़ी लंबी है। शीला दीक्षित सरकार ने दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को ठीक करने के लिए डीम्स को दिल्ली के परिवहन विभाग के समानांतर एक संस्थान बना दिया गया, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। कांग्रेस की सरकार ने 1300 करोड़ की लागत का सिग्नेचर ब्रिज क्यों बनाने कै फैसला किया, ये किसी की भी समझ में नहीं आया। उत्तर-पूर्व दिल्ली को बाकी दिल्ली से जोड़ने के लिए यमुना पर कम पैसे में साधारण पुल क्यों नहीं बनाए गए या हर स्तर पर मना करने के बावजूद बीआरटी कॉरिडोर पर प्रयोग के नाम पर करीब 400 करोड़ रुपए क्यों बर्बाद किए गए। इतना ही नहीं दिल्ली की हर छोटी-मोटी सड़क पर भी महंगी लो-फ्लोर बसें क्यों चलवाई गई। ये कुछ ऐसे सवाल है जिसका जबाव अब शीला दीक्षित को देना पड़ सकता है।
दिल्ली के चुनाव में अहम मुद्दा बनी बिजली-पानी के समले को देखे तो शीला दीक्षित की सरकार यहां भी घिर गई। अगर सरकार चाहती तो 15 सालों में दिल्ली जल बोर्ड को सुधार लेती। अगर बात बिजली की करें तो बिजली के दाम बढ़ाने की जब-जब डीईआरसी ने सिफारिशें की सरकार ने उसे पौरन मान लिया और एक खास वर्ग को उपकृत करने के लिए जनता के ही पैसे से उन्हें सब्सिडी दे दी। कांग्रेस की सरकार ने बिजली चोरी को रोकने के लिए कोई अहम कदम नहीं उठाए।












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