मुजफ्फरनगर में भाजपा की राह पर चलना कहीं भारी ना पड़ जाए सपा-रालोद गठबंधन को

मुजफ्फरनगर, 24 जनवरी। उत्तर प्रदेश में पहले चरण के मतदान में मुजफ्फरनगर अहम जिला है, यहां कुल 6 विधानसभा सीटें हैं। लेकिन अहम बात यह है कि सपा-आरएलडी गठबंधन ने यहां से एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। ऐसे में स्थानीय लोगों को भी सपा-आरएलडी के गठबंधन के इस फैसले से आश्चर्य हो रहा है। राजनीति विश्लेषकों का कहना है कि गठबंधन के इस फैसले से स्थानीय नेता भी सकते में हैं, सपा-आरएलडी के उम्मीदवारों को इसकी वजह से कुछ सीटों पर नुकसान भी हो सकता है। अहम बात यह है कि भाजपा ने भी इन सीटों पर हिंदू उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस ने दो मुस्लिम उम्मीदवार और बसपा ने तीन मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है।

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माना जा रहा है कि सपा-आरएलडी को इस बात का डर है कि अगर उन्होंने मुस्लिम समुदाय से उम्मीदवार को टिकट देने से वोटों में बंटवारा हो सकता है, जिसका भाजपा को फायदा मिल सकता है। लेकिन इसका उल्टा नतीजा यह भी हो सकता है कि मुस्लिम वोटर किसी दूसरे दल के पास चले जाएं और सपा-आरएलडी गठबंधन को इसका नुकसान उठाना पड़े। आधिकारिक आंकड़े की बात करें तो मुजफ्फरनगर की कुल आबादी 25 लाख है, यहां तकरीबन 42 फीसदी मुस्लिम हैं। भाजपा ने यहां से 2017 में हिंदू उम्मीदवार को टिकट दिया था, जिसे जीत मिली थी। बसपा ने तीन मुस्लिम और सपा ने दो मुस्लिम उम्मीदवारों को पिछले चुनाव में टिकट दिया था।

इस चुनाव में कांग्रेस, बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों को चरथवाल और मीरपुर सीट से टिकट दिया है। बसपा के पूर्व विधायक मुर्सलीन राणा ने आरएलडी का हाथ थाम लिया है और वह भी चरथवाल से चुनाव लड़ना चाहते थे। उन्होंने कहा कि आरएलडी मुजफ्फरनगर से मुस्लिमों को टिकट देना चाहती थी, लेकिन सपा इसके लिए तैयार नहीं थी। ऐसे में संभव है कि गठबंधन को मुजफ्फरनगर में तीन सीटों का नुकसान हो सकता है। बसपा के उम्मीदवार को यहां अधिक वोट मिल सकते हैं।

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