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Chaitra Navratri Special: मां विंध्यवासिनी मंदिर, अष्टभुजा, कालीखोह! जानिए क्या है इनके पीछे की पौराणिक कथा

इन मंदिरों की मान्यता इतनी है कि लाखों की संख्या में हर साल नवरात्रों में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। यहाँ आकर दर्शन करने मात्र से धन, यश व कीर्ति में बढ़ोतरी होती है।

Chaitra Navratri Special Maa Vindhyavasini Temple Ashtabhuja Kalikhoh Know the mythology

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित मां विंध्यवासिनी मंदिर, अष्टभुजा व कालीखोह में नवरात्रि के पहले दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं ने दर्शन पूजन किया। श्रद्धालुओं की इतनी भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन की तरफ से सुरक्षाकर्मी लगाए गए थे। 51 शक्तिपीठों में से एक मां विंध्यवासिनी मंदिर में दूर दराज से पहुंचकर श्रद्धालुओं ने दर्शन पूजन किया।

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जानिए क्या है मां विंध्यवासिनी का इतिहास
मां विंध्यवासिनी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां स्थित विंध्य क्षेत्र सृष्टि के आरंभ होने से पहले और प्रलय आ जाने के बाद भी ऐसे ही बरकरार रहेगा। पुराणों में भी विंध्य क्षेत्र को विशेष महत्व दिया गया है। गंगा किनारे स्थित मां विंध्यवासिनी मंदिर को लेकर मान्यता है कि राजा प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में मां जगदंबिका ने जन्म लिया था। सती के रूप में जन्मी मां जगदंबिका का विवाह भगवान शिव से हुआ था। विवाह के बाद दक्ष के द्वारा एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया। इस यज्ञ में भगवान शिव को नही बुलाया गया।
भगवान शिव को नही बुलाये जाने से नाराज सती ने कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। प्राण आहुति देने के बाद नाराज हुए भगवान शिव तांडव करने लगें। भगवान ब्रह्मा के द्वारा भगवान विष्णु से आग्रह किये जाने के बाद सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 51 टुकड़े कर दिए गए। जिस जगह पर टुकड़े गिरे, उस स्थान पर एक नया शक्तिपीठ बन गया। इन्ही 51 शक्तिपीठों में से मां विंध्यवासिनी देवी एक है। मार्कण्डेय पुराण में मां विन्ध्यवासिनी मंदिर का जिक्र है।

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खेचरी मुद्रा में है मां कालीखोह का स्वरूप
मां विंध्यवासिनी मंदिर से तीन किलोमीटर दूरी पर स्थित मां विंध्यवासिनी का महाकाली स्वरूप स्थित है। कालीखोह में स्थित महाकाली स्वरूप खेचरी मुद्रा में है। पुराणों में ऐसी मान्यता है कि रक्तबीज दानव ब्रहा के आशीर्वाद के बाद स्वर्ग लोक से ब्रहा, विष्णु व महेश सहित अन्य देवताओं को भी भगा दिया था। रक्तबीज दानव को आशीर्वाद था कि उसका एक बूंद खून जमीन पर गिरेगा तो लाखों दानव पैदा होंगे। ब्रहा, विष्णु व महेश सहित अन्य देवताओं के आग्रह से मां विंध्यवासिनी ने महाकाली स्वरूप धारण करके रक्तबीज दानव का वध किया, ताकि एक बूंद रक्त जमीन पर न गिरने पाये। कहा जाता है कि इनके मुख में कितना प्रसाद चढ़ा दीजिये पता तक नही चलता है। नवरात्रि में यहां पर श्रद्धालु तंत्र विद्याओं की सिद्धि के लिए आते है।

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भगवान श्रीकृष्ण की छोटी बहन है मां अष्टभुजा
मां विंध्यवासिनी मंदिर से दो किलोमीटर दूरी पर मां अष्टभुजा का मंदिर स्थित है। माँ अष्टभुजा के दरबार में भारी संख्या में श्रद्धालु आते है। ऐसी मान्यता है कि पापी कंस ने अपनी मृत्यु के डर से अपनी बहन देवकी को आकाशवाणी होने के बाद कारागार में कैद कर दिया था। जहां कोख से जन्म लेने वाले हर एक बच्चे का वध कर देता था। इसी बीच देवकी की कोख से मां अष्टभुजा जन्म लेती है। कंस जैसे ही वध करने वाला होता है वो उनके हाथों से छूटकर विंध्याचल पहाड़ी पर विराजमान हो जाती है। मां स्वरस्वती रूप में स्थित मां अष्टभुजा के दर्शन के लिए लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है।

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    मां के दर्शन से धन, यश व कीर्ति में होता है बढ़ोतरी
    मां विंध्यवासिनी देवी, कालीकोह व अष्टभुजा में दर्शन करने से धन, यश व कीर्ति में बढ़ोतरी होती है। विंध्य पर्वत पर स्थित मां के स्वरूप के एक साथ दर्शन करने पर अरोग्य के साथ ललाट सूर्य की तरह चमकता है। माँ के दरबार में उत्तर प्रदेश के साथ ही सबसे ज्यादा बिहार से श्रद्धालु आते है। यही नही देश व विदेश से मां के भक्त दर्शन के लिए यहां आते हैं। सरकार के द्वारा मां विंध्यवासिनी मंदिर में आयोजित मेले को राज्यस्तरीय मेला घोषित किया गया है। जिसके बाद से ही यहां पर अलग और दिव्य व्यवस्था हर नवरात्रि में की जाती है।

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