हम आपके दुश्मन नहीं...महाराष्ट्र में उद्दव ठाकरे के बदले सुर, क्या करने वाले हैं भाजपा से दोस्ती?
Why Uddav Thackeray's tone changed: महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना (यूबीटी) के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के सुर कुछ बदले-बदले नजर आए। रविवार को उद्धव ने एक जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ऐसी बात कहीं, जिसे सुनकर कुछ लोगों को अजीब लगा वहीं कई सोच में पड़ गए।

इस बयान के बाद से ही उद्वव ठाकरे की भाजपा में वापसी के कयास लगाए जा रहे है! ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख इंडिया गठबंधन से अलग होकर लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा से दोस्ती करने जा रहे हैं? आइए जानते हैं...

दुश्मन नहीं दोस्त, हम आपके साथ....
पहले बता दें रविवार को सिंधूदुर्ग के सावंत वाडी में एक रैली को संबोधित किया जिसमें उन्होंने कहा उद्धव ठाकरे ने कहा
मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को बताना चाहता हूं कि हम आपके कभी भी दुश्मन नहीं थे, हम आपके साथ थे, शिवसेना आपके साथ थी। हमने तो पिछले चुनाव में अपने गठबंधन के लिए प्रचार भी किया था।
ठाकरे ने स्पष्ठ कहा हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले भी दुश्मन नहीं थे आज भी नहीं है। शिवसेना से संबंध तोड़ने का फैसला हमने नहीं पीएम मोदी ने ही किया। हमारा हिंदुत्व और भगवा ध्वज आज भी कायम है....उन्होंने कहा अगर आपके चिल्ले-पिल्ले ठीक से काम करते तो आपको देश भर में ये पार्टियां तोड़ने-फोड़ने की नौबत न आती।
नीतीश कुमार के बाद अब उद्वव ठाकरे
उद्धव ठाकरे का बदला-बदला रवैय्या ऐसे समय में आया है जब अभी कुछ ही दिन पहले बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लालू यादव की पार्टी से अलग होकर भाजपा से चौथी बार हाथ मिलाकर एनडीए में वापसी कर चुके हैं। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार के बाद अब महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे का मन डोलने लगा है!
क्या सच घर वापसी करना चाहते हैं उद्धव?
बता दें महाविकास अघाड़ी गठबंधन में शामिल शिवसेना (यूबीटी) के नेता उद्धव ठाकरे जिनकी पार्टी विरोधी इंडिया गठबंधन में भी शामिल हैं।
पीएम मोदी के प्रति उद्वव ठाकरे के बदले हुए ये सुर लोकसभा चुनाव 2024 से पहले उद्वव ठाकरे अपनी पार्टी के साथ समान विचारधारा वाली "श्रीराममय भाजपा" के साथ दोस्ती कर, एनडीए गठबंधन में शामिल होकर लोकसभा चुनाव से पहले घर वापसी करना चाहते हैं!
भाजपा से दोस्ती करना उद्धव ठाकरे की मजबूरी?
लोकसभा चुनाव से पहले भगवा पार्टी से दोबारा दोस्ती करना अगर सच कहें तो उद्धव ठाकरे की बड़ी मजबूरी भी बनता जा रहा है क्योंकि इस मजबूरी के पीछे कई वजहें हैं। जिसमें प्रमुख वजह महाराष्ट्र में बाबा साहेब बाल ठाकरे स्थापित 57 साल पुरानी पार्टी शिवसेना का अधिकार और निशान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना को मिल चुका है।
भले ही उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) कितने भी वास्तविक शिवसेना होने का दावा करती रहे लेकिन शिंदे की बगावत ने उद्धव की सेना को कमजोर कर दिया है।
जब रातों-रात धराशायी हो गई थी उद्वव ठाकरे की सरकार
गौरतलब है कि 18 माह पहले 39 विधाककों को लेकर एकनाथ तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से बगावत कर अलग हो गए और भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली थी। शिंदे के इस कदम से 2019 में उद्धव ठाकरे की सीएम बनने की जिद के कारण एनडीए गठबंधन से अलग हुई हिंदुत्ववादी शिवसेना ने विरोधी पार्टी कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर जो महाविकास अगाड़ी सरकार बनाई थी वो मिनटों में धरासायी हो गई थी।
ना माया मिली ना राम...
जिसके बाद उद्धव ठाकरे गुट और शिंदे गुट ने विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग को लेकर याचिका दाखिल की थी। जिसमें महाराष्ट्र विधानसभा स्पीकर ने राहुल नार्वेकर ने अपने निर्णय में सीएम शिंदे और उनके गुट के विधायकों को योग्य बताते हुए उनकी ही शिवसेना को असली शिवसेना करार दिया।
हालांकि उद्धव ठाकरे अपने पिता बाल ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना को वापस पाने के लिए लड़ाई लड़ रहे लेकिन इस पर कोई फैसला आए उससे पहले सिर पर लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव है। ऐसे में उद्धव ठाकरे का मन डोलना लाज़मी है! हालांकि कहावत है ना "राजनीति में ऊंट किस करवट बैठेगा..." लोकसभा चुनाव से पहले महाराष्ट्र की राजनीति में क्य होगा, ये आने वाला समय ही बताएगा!












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