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भाषा के आधार पर भेदभाव करना गलत, जानिए उर्दू विवाद पर Supreme Court ने क्या कहा?

Supreme Court on Urdu language: 15 अप्रैल को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी फैसले में उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें महाराष्ट्र के नगर परिषद की नई इमारत पर उर्दू भाषा में साइनबोर्ड लगाने को चुनौती दी गई थी। इस मामले ने तूल पकड़ा और सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जिस पर न्यायालय ने यह निर्णय लिया।

क्या है पूरा मामला? सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे प्रकरण और देश की भाषाई समृद्धता पर क्या कहा आईए विस्तार से जानते हैं..

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Supreme Court on Urdu language: क्या है पूरा मामला?

इस पूरे मामले की शुरूआत साल 2020 में एक स्थानीय सभासद की साइनबोर्ड पर उर्दू लिखावट से हुई है। दरअसल, अकोला जिले की पाटूर नगर परिषद की पूर्व सभासद वर्षा ताई संजय वाघले ने साइनबोर्ड पर उर्दू भाषा का विरोध किया।

वर्षा ताई ने नगर परिषद में शिकायत की और साइन बोर्ड से इसे हटाने को कहा लेकिन नगर परिषद ने ऐसा करने से मना कर दिया और कहा कि उर्दू यहां पर 1956 से चलती आ रही है और यहां के स्थानीय निवासी इसे आसानी से समझते हैं।

इसके बाद वर्षा ताई ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की इस पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि उर्दू भाषा को सही ठहराया था। इसके बाद ये उर्दू विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है जहां न्यायालय ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली इस याचिका को खारिज करते हुए इस बात पर प्रकाश डाला कि भाषा समाज में विभाजन की रेखाएं नहीं खींचती, बल्कि यह लोगों को जोड़ने का माध्यम होती है।

Supreme Court on Urdu language: सुप्रीम कोर्ट ने उर्दू भाषा पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन शामिल थे, ने स्पष्ट किया कि किसी एक अतिरिक्त भाषा का प्रयोग महाराष्ट्र स्थानीय प्राधिकरण (राजभाषा) अधिनियम, 2022 के अंतर्गत निषिद्ध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उर्दू का प्रयोग किसी भी प्रकार से इस अधिनियम का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि यह स्थानीय निवासियों से प्रभावी संवाद स्थापित करने का माध्यम है।

अपने फैसले में न्यायमूर्ति धूलिया ने अपने लिखित निर्णय में उल्लेख किया कि नगर परिषद का कार्य जनता को सेवाएं देना है, न कि भाषा के आधार पर भेदभाव करना। यदि किसी क्षेत्र में उर्दू-भाषी लोग रहते हैं, तो मराठी के साथ-साथ उर्दू का उपयोग करना स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है ताकि सभी नागरिकों तक संदेश प्रभावी ढंग से पहुँच सके।

उर्दू और हिंदी का गहरा नाता

सुप्रीम कोर्ट ने जोर देते हुए कहा कि हिंदी और उर्दू की भाषाई जड़ें एक-दूसरे से इतनी गहराई से जुड़ी हैं कि उन्हें अलग-अलग करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। न्यायालय ने कहा कि "हिंदी में बिना उर्दू शब्दों के दैनिक बातचीत की कल्पना भी कठिन है।" इतना ही नहीं, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि 'हिंदी' शब्द स्वयं फारसी के 'हिंदवी' से निकला है, जो भाषाओं के आपसी आदान-प्रदान की पुष्टि करता है।

Supreme Court on Urdu language:

भाषा में उर्दू की उपस्थितिॉ

वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्रवाई में उर्दू के योगदान पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत की न्यायिक प्रणाली में भी उर्दू भाषा का गहरा प्रभाव है। "वकालतनामा", "दस्ती", "पेशी", "अदालत", "हलफनामा"-ये सभी शब्द न केवल आम भाषा में बल्कि भारत की न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

भले ही अनुच्छेद 348 के अनुसार उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट की भाषा अंग्रेजी है, फिर भी उर्दू शब्दों का प्रयोग न्यायिक दस्तावेजों और प्रक्रियाओं में स्पष्ट रूप से होता है।

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