Raj-Uddhav Thackeray News: क्या साथ आकर बचेगा ठाकरे ब्रांड? उद्धव-राज ठाकरे की 'संभावित दोस्ती मजबूरी या मौका?
Raj-Uddhav Thackeray News: पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र की राजनीति में एक ही सवाल गूंजता रहा। क्या उद्धव और राज ठाकरे फिर एकजुट होंगे? चौक-चौराहों से लेकर मीडिया की सुर्खियों तक ये सवाल गूंज रहा है।
इस चर्चा की वजह बनी फिल्म निर्माता महेश मांजरेकर का पॉडकास्ट, जिसमें महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने 'मराठी मानूस' के मुद्दे पर उद्धव ठाकरे के साथ आने की इच्छा जताई। राज ने कहा, 'हमारे मतभेद महाराष्ट्र और मराठी जनता के मुद्दों के सामने बहुत छोटे हैं। अगर उद्धव साथ आते हैं, तो मैं भी तैयार हूं।'

क्या उद्धव मानेंगे? या फिर वही पुरानी दूरी?
राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया में यह खबर टॉप हेडलाइन बन गई। लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब उद्धव ने सकारात्मक संकेत दिए, मगर कुछ शर्तों के साथ। यह पहला मौका नहीं है जब ठाकरे बंधुओं की 'मुलाकात' की खबरें सुर्खियों में हैं।
2017 बीएमसी चुनाव के दौरान भी पुनर्मिलन की कोशिशें हुई थीं, लेकिन बात नहीं बनी। उद्धव ने तब राज द्वारा भेजे दूत से मिलने से इनकार कर दिया था और अपने नेताओं से बात करने को कहा।
अब 2025 में, उद्धव का सशर्त समर्थन राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है वो इस बार 'खलनायक' की छवि नहीं चाहते, जैसी 2017 में बनी थी।
उद्धव और राज दोनों की राजनीति संकट में
बता दें कि,उद्धव ठाकरे पहले ही अपनी पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और बड़े नेताओं को एकनाथ शिंदे गुट के हाथों खो चुके हैं। उनके सामने राजनीतिक अस्तित्व बचाने की चुनौती है।
वहीं हाल ही के विधानसभा चुनावों में उद्धव का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा, जबकि राज ठाकरे की पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। यहां तक कि उनके बेटे अमित ठाकरे को भी हार का सामना करना पड़ा। यदि ठाकरे बंधु एकजुट होते हैं, तो बालासाहेब ठाकरे की विरासत पर उनका दावा और भी मजबूत हो सकता।
राज ठाकरे का समीकरण: गठबंधन की मजबूरी या रणनीति?
राज ठाकरे की 2014 से लगातार गिरती राजनीतिक पकड़ और बदलते राजनीतिक रुख़ उन्हें मजबूर कर रहे हैं कि वह किसी मजबूत सहयोगी का सहारा लें।
- 2014 में उन्होंने मोदी का समर्थन किया, लेकिन औपचारिक गठबंधन नहीं हुआ।
- 2019 में बीजेपी का विरोध किया और कांग्रेस-एनसीपी को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया।
- ईडी के समन के बाद फिर से रुख बदला और 2024 में बीजेपी के समर्थन में आ गए।
राज ने हाल में डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस की सराहना की और शिंदे के साथ निजी डिनर भी किया। यह सब संकेत हैं कि राज महायुति में जगह चाहते हैं। लेकिन वहां से कोई ऑफर नहीं मिलने के बाद राज ठाकरे अब शिवसेना (UBT) का साथ चाहते हैं।
उद्धव ठाकरे भी वोट बैंक खो चुके हैं
वहीं उद्धव ठाकरे की पार्टी अपने बेमेल गठबंधन की वजह से अपना आधार वोट बैंक खो चुकी है। उनकी पार्टी की छवि अब हिंदुत्ववादी नहीं रही। इसके अलावा भी गठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। इसी को लेकर उद्धव कुछ नया करना चाहते हैं। कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिससे उनका वोट बैंक वापस लौट जाए।
क्या एकजुटता संभव है?
- वोटर बेस का टकराव:दोनों पार्टियों का वोट बैंक और क्षेत्र लगभग समान है।
- विचारधारा का अंतर: राज अब हिंदुत्व और मराठी अस्मिता दोनों को साधना चाहते हैं, जबकि उद्धव पहले ही कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन कर चुके हैं - जिससे उनके मूल हिंदुत्व समर्थक नाराज़ हुए हैं।
- कार्यकर्ताओं की दुश्मनी:2005 के बाद से दोनों दलों के जमीनी कार्यकर्ताओं में भी गहरी प्रतिस्पर्धा और कटुता है।
- शैली का टकराव:राज का आक्रामक रवैया और उद्धव की संयमित राजनीति टकरा सकती है।
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तो क्या होगा आगे?
अगर यह सामरिक गठबंधन होता है, तो मुंबई, ठाणे, नासिक जैसे क्षेत्रों में मराठी वोटरों को एक साथ साधने में फायदा मिल सकता है। लेकिन अंत में सवाल यह रहेगा कि,
- क्या उद्धव कांग्रेस-एनसीपी के साथ रहते हुए MNS को अपनाएंगे?
- क्या राज, जो बार-बार पाला बदलते रहे हैं, उद्धव के साथ भरोसे का रिश्ता बना पाएंगे?
फिलहाल, ठाकरे बंधुओं की यह संभावित दोस्ती महाराष्ट्र की राजनीति में दिलचस्प मोड़ जरूर ला सकती है। मगर मंज़िल अब भी दूर है।
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