महाराष्ट्र चुनाव में किधर जाएंगे 10 लाख ईसाई वोट, क्या हैं उनके असली मुद्दे?

Maharashtra Chunav 2024: महाराष्ट्र में जहां विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) बीजेपी और महायुति गठबंधन पर हिंदुओं के ध्रुवीकरण का आरोप लगा रहा है। वहीं बीजेपी और महायुति गठबंधन कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के खिलाफ मुस्लिम तुष्टिकरण को मुद्दा बना रही है। राज्य में मुसलमानों की आबादी करीब 11.5% है। ऐसे में यह समझना भी आवश्यक है कि एक और अल्पसंख्यक समुदाय ईसाइयों की इन चुनावों में क्या स्थिति है।

तथ्य यह है कि जब महाराष्ट्र में मुसलमानों की शिकायत रही है कि उन्हें राजनीतिक दल चुनावों में भागीदार बनाने में दिलचस्पी नहीं लेते हैं, उन्हें तो सिर्फ उनका वोट चाहिए। फिर ईसाई समुदाय के लोग किसी भी पार्टी से क्या उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन, फिर भी राजधानी मुंबई में समुदाय के नेताओं की ओर से अपने लोगों को यह संदेश जरूर दिया जा रहा है कि 20 नवंबर के चुनाव में मतदान से पीछे ना रहें।

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ईसाइयों को धर्मांतरण-विरोधी कानूनों से शिकायत
टीओआई ने वरिष्ठ पादरियों,एनजीओ, समुदाय के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेष तौर पर युवाओं से बातचीत के आधार पर यह समझने की कोशिश की है कि इस बार के विधानसभा चुनावों को लेकर ईसाइयों का मूड क्या है। जैसे समस्त क्रिस्टी समाज नाम के एजीओ फेडरेशन के कोर ग्रुप के सदस्य सिरिल दारा ने कहा, 'ईसाइयों को धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के माध्यम से निशाना बनाया जाता है।'

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वे कहते हैं, 'इन कानूनों की वजह से ऐसा माहौल बना है, जहां अल्पसंख्यक धर्म में धर्मांतरण बहुत खतरनाक है, और धर्मशिक्षा को साझा करने से उत्पीड़न हो सकता है। चरमपंथी तत्व पादरियों पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए लोगों को प्रलोभन देने का झूठा आरोप लगाते हैं या कहते हैं कि चर्च के नेता मासूम लोगों को जबरन यीशु का अनुयायी बनाते हैं।' उन्होंने हाल ही में अंधेरी में एक ऐसी ही कथित घटना का दावा भी किया है।

एमवीए के पक्ष में दिखा रहे हैं रुख?
ऐसा नहीं है कि ईसाई समुदाय के सामने आम जन-जीवन से जुड़े मुद्दे नहीं हैं या उसका उनपर कोई असर नहीं पड़ रहा है। लेकिन, ईसाई समुदाय के ज्यादातर नेताओं की चिंता कथित तौर पर कानूनों के दुरुपयोग की दिखती है और यह भी दावा करते हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता की कमी है। इसी भावना को जाहिर करते हुए आर्चडायोसिस से जुड़े बिशप ऑल्विन डी सिल्वा कहते हैं, 'संविधान का सम्मान करने वाली पार्टियों को वोट दें।'

वे खुलकर समुदाय के सदस्यों का आह्वान करते हैं, 'हमें सांप्रदायिक तनाव, बढ़ती आर्थिक असमानता, रोजगार की कमी और धर्मांतरण विरोधी विधेयक जैसे अनेकों अन्याय से संबंधित मुख्य मुद्दों पर लोगों की अंतरात्मा को जगाना होगा।'

सिरिल दारा का कहना है, 'आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक महाराष्ट्र में 10,00,000 या 1% ईसाई वोटर हैं। पार्टियां इन्हें अहम नहीं मानतीं, क्योंकि यह निर्णायक फैक्टर नहीं हैं। लेकिन समुदाय जानता है कि यह चुनाव.... बढ़ती असहिष्णुता की वजह से धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।'

बीते जमाने को याद करके भी मायूस हो रहे हैं ईसाई नेता
महाराष्ट्रियन ईस्ट इंडियन क्रिश्चियन फेडरेशन के प्रेसिडेंट हर्बर्ट बैरेटो उन दिनों को याद करते हैं जब 80 और 90 के दशक में मुंबई और आसपास की सीटों, जैसे कोलाबा, बांद्रा, कुर्ला, कलिना, मीरा-भायंदर और वसई में ईसाई एमएलए हुआ करते थे।

कांग्रेस से इस वजह से नाखुशी भी जता रहे हैं समुदाय के लोग
वे कहते हैं,'कांग्रेस, एनसीपी और दोनों शिवसेना ने जिस तरह से टिकट वितरण में हमारे लोगों को नजरअंदाज किया है, उससे समुदाय उनसे नाखुश है। कांग्रेस को लगता है कि हमारे पास उनके अलावा वोट देने का कोई विकल्प नहीं है। बीजेपी को लगता है कि सभी ईसाई उनके खिलाफ जाएंगे, लेकिन यह नहीं समझती कि कांग्रेस से मायूसी की वजह से 2014 में कई कैथोलिक ने उनको वोट दिया था।'

इसी तरह ठाणे में भी एक ईसाई नेता ने इस बात को लेकर दुख जताया है कि 'कांग्रेस की उम्मीदवारों की लिस्ट से ईसाई गायब हैं', जबकि वह 'धर्मनिरपेक्षता और समुदाय के प्रति वफादारी' का दावा करती है।

'अपनी अंतरात्मा के आधार पर वोट दें'
वैसे बॉम्बे आर्चडायोसिस के प्रवक्ता फादर निगेल बैरेट ने कहा है, 'हम ईसाइयों से आग्रह करते हैं कि वह मतदान करके अपनी नागरिक जिम्मेदारी को पूरा करें। एक चर्च के तौर पर हम न तो किसी राजनीतिक दल और ना ही व्यक्तिगत उम्मीदवारों का समर्थन कर सकते हैं। हम लोगों से कहेंगे कि अपनी अंतरात्मा के आधार पर वोट दें और हमारे संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को कायम रखें।'

वहीं कुछ ईसाई नेता ऐसे भी मिले हैं, जो खुलकर वही मुद्दे उठा रहे हैं, जो विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) के नेता बीजेपी और महायुति गठबंधन पर हमले के लिए उठाते रहे हैं।

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