Maharashtra 70 year old Case: 30 साल के आरोपियों पर केस, अब दोनों 'लापता'! कोर्ट ने ट्रायल बंद किया
भारत के सबसे पुराने अदालती ट्रायल को 70 साल बाद महाराष्ट्र में रोका गया। 'ड्रंक मैन' लापता होने का मामला रायगड का है।

Maharashtra 70 year old Case : महाराष्ट्र के रायगड जिले में लगभग 70 साल पहले दर्ज हुए दो मामलों का आखिरकार निस्तारण कर दिया है। 9 फरवरी को प्रधान न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट नीलेश वली की अदालत ने भारत के सबसे पुराने अदालती ट्रायल रोकने का फैसला लिया। उरण पुलिस स्टेशन में दर्ज केस देश के सबसे पुराने आपराधिक मामलों में से एक है जिसमें एक 1953 में और दूसरा 1955 में दर्ज किया गया।
सभी जजों के जन्म से पहले का मामला!
महाराष्ट्र और देश के सबसे पुराने क्रिमिनल केस के संबंध में टाइम्स ऑफ इंडिया (टीओआई) की रिपोर्ट के मुताबिक रायगड में ट्रायल कोर्ट के समक्ष लंबित मामलों की दशकों पुरानी रिपोर्ट 9 जनवरी को सामने आई। इस खबर में कहा गया है कि संभवत: ये एक दुर्लभ मामला है जब देश के वर्तमान वरिष्ठतम न्यायाधीशों में से कोई भी नहीं था। इनमें सुप्रीम कोर्ट के 32 वर्तमान जज भी शामिल हैं। गायब हो चुके दो संदिग्धों पर चोरी और निषेध कानून के उल्लंघन से संबंधित आरोप लगे थे।
105 साल होगी आरोपी की आयु
उरण के ट्रायल कोर्ट में न्यायाधीश नीलेश वली ने विगत 3 जनवरी को दोनों आरोपियों को के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया। आरोपियों को 9 फरवरी को पेश करने का आदेश दिया गया। उप पुलिस आयुक्त पंकज दहाणे ने कहा, "दोनों के ठिकाने का पता नहीं है। जब प्राथमिकी दर्ज की गई थी तब आरोपियों की आयु करीब 30 साल थी। आज दोनों की उम्र करीब 105 साल होगी।
दोबारा शुरू हो सकता है मामला
पुलिस की रिपोर्ट जिसमें कहा गया कि आरोपी लापता हैं, मजिस्ट्रेट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 258 के तहत कार्यवाही को अस्थायी रूप से बंद कर दिया। खबर में कहा गया कि संदिग्ध आरोपियों के पाए जाने पर 7 दशक पुराने आपराधिक मुकदमे फिर से शुरू हो सकते हैं।
न्यायिक मजिस्ट्रेट ने रोक दी कार्यवाही
रायगड के इस अनोखे मामले में टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार उरण पुलिस ने चोरी और मद्यनिषेध कानून के उल्लंघन के आरोप में करीब सात दशक पहले 30 साल के दो लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। दोनों बाद में फरार हो गए थे। कोर्ट ने पुलिस को हाल ही में उनके द्वारा दिए गए पते के पड़ोस में पूछताछ के लिए भेजा गया था। बाद में जैसे ही पुलिस ने एक रिपोर्ट सौंपी कि उनका पता नहीं चल रहा है, उरण में न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) की अदालत ने कार्यवाही को अस्थायी रूप से रोक दिया।
मई, 1953 में दर्ज हुआ केस
कॉन्स्टेबल अस्तक शरीफ ने इस मामले में कहा, अगर पुलिस उन्हें खोज लेती है, तो अदालत मामले की सुनवाई दोबारा शुरू कर सकती है। उरण जेएमएफसी अदालत में रिपोर्ट जमा करने और सुनवाई में शामिल होने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तलाश में गए पुलिसकर्मी मुख्य रूप से वरिष्ठ नागरिकों पर फोकस कर रहे थे। इंस्पेक्टर सुनील पाटिल ने कहा कि दो मामलों में से एक 18 मई, 1953 को जंगबहादुर बृजलाल जोशी नाम के एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज किया गया था। उस समय आरोपी की आयु 35 साल थी। आरोपी का पता मुंबई में जनरल पोस्ट ऑफिस के पास का था। जोशी पर महाराष्ट्र मद्यनिषेध अधिनियम, 1951 की धारा 66 (ई) के तहत मामला दर्ज किया गया था, क्योंकि उन्हें मोरा जेट्टी में एक सार्वजनिक स्थान पर नकली शराब के नशे में पाया गया था।
निष्क्रिय हो गया मामला
जोशी के पास शराब का परमिट नहीं था। जमानत पर रिहाई के बाद, जोशी एक साल से अधिक समय तक अदालत की सुनवाई में शामिल नहीं हुए। पुलिस उनकी तलाश नहीं कर सकी। 24 नवंबर, 1954 को, उरण जेएमएफसी अदालत ने कहा कि मामला "निष्क्रिय" (dormant) हो गया था। इंस्पेक्टर सुनील पाटिल ने कहा, "दूसरा मामला 9 अगस्त, 1955 को रत्नागिरी के नेवारे गांव के रहने वाले शंकर सोनू मालगुंड के खिलाफ दर्ज किया गया था। मालगुंड एक शेवा ग्रामीण के लिए घरेलू मदद के रूप में काम करता था।" उसने कथित तौर पर अपने नियोक्ता से नकदी और 30 ग्राम सोने के गहने चुराए थे, जिनकी कीमत 240 रुपये (तब सोना लगभग 88 रुपये प्रति 10 ग्राम था) था।
नहीं बरामद हुआ आरोपी
पाटिल ने बताया कि मालगुंड पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 381 के तहत मामला दर्ज किया गया था। वह भी सुनवाई के लिए उपस्थित होने में विफल रहे। इसके बाद 26 जून, 1956 को उरण जेएमएफसी अदालत ने इस मामले को भी डॉरमैंट यानी निष्क्रिय करार दिया। संदिग्धों का पता लगाने के अपने प्रयासों के बारे में बोलते हुए, उरण के कॉन्स्टेबल शरद भट ने कहा, "वरिष्ठ निरीक्षक के आदेश के अनुसार, मैंने मुंबई में रेस्तरां और कैंटीन में पूछताछ की, जहां जोशी काम करते थे, लेकिन कोई भी उनके बारे में जानकारी नहीं दे सका। मैंने इलाके के कुछ वरिष्ठ नागरिकों से भी पूछताछ की, उन्होंने दावा किया कि जोशी या मालगुंड के बारे में कभी सुना ही नहीं। बकौल शरद भट, मालगुंड को खोजने के लिए उन्होंने नेवारे के पुलिस पाटिल (ग्राम प्रधान) से संपर्क किया, जहां आरोपी मालगुंड रहता था। उन्होंने ग्राम पंचायत के रिकॉर्ड की जांच की, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली।"












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