Maharashtra: बदलापुर यौन उत्पीड़न मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्देश, आरोपी के माता-पिता को नहीं मिले सजा

Maharashtra News: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बदलापुर यौन उत्पीड़न मामले में मृत आरोपी के माता-पिता के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई के प्रति सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार से आग्रह किया है कि वह इन माता-पिता को आश्रय और रोजगार प्रदान करने पर विचार करे।

क्या है पूरा मामला

न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे और पृथ्वीराज चव्हाण की पीठ ने इस मुद्दे पर सुनवाई की। आरोपी ठाणे जिले के बदलापुर में एक स्कूल में अटेंडेंट के रूप में कार्यरत था। उसे अगस्त में दो नाबालिग लड़कियों के यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। सितंबर में कथित पुलिस मुठभेड़ में आरोपी की मौत हो गई।

bombay high court

इस घटना के बाद आरोपी के माता-पिता को सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने अदालत को बताया कि हमें हमारे घर से निकाल दिया गया है। हम कल्याण रेलवे स्टेशन पर रह रहे हैं। हमारे पास नौकरी नहीं है। न ही कोई वित्तीय सहायता है।

अदालत का बयान और निर्देश

पीठ ने जोर देकर कहा कि माता-पिता को उनके बेटे के कथित अपराध के लिए सजा नहीं मिलनी चाहिए। अदालत ने कहा कि यह उनकी गलती नहीं है। उन्हें अपने बेटे पर लगे आरोपों के लिए क्यों भुगतना चाहिए। उन्हें समाज और सरकारी तंत्र की दंडात्मक प्रतिक्रिया का सामना नहीं करना चाहिए।

लोक अभियोजक हितेन वेनेगांवकर को निर्देश दिया गया कि वे राज्य सरकार या गैर-सरकारी संगठनों से माता-पिता को सहायता प्रदान करने के लिए संभावनाएं तलाशें। अदालत ने राज्य सरकार से पुनर्वास के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा। जिसमें माता-पिता के लिए स्थायी आश्रय और रोजगार सुनिश्चित करना शामिल है।

बाल सुरक्षा पर विशेष समिति का गठन

बदलापुर मामले में कथित यौन उत्पीड़न के खुलासे के बाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में बाल सुरक्षा उपायों का आकलन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन का निर्देश दिया। इस समिति को जनवरी 2025 तक अपनी रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया है।

मामले की अगली सुनवाई

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 जनवरी 2025 की तारीख तय की है। बॉम्बे हाईकोर्ट का यह कदम मानवता और न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मृत आरोपी के माता-पिता को उनके बेटे के कृत्यों के लिए दंडित न करने का निर्देश न केवल उनकी कठिनाइयों को समझने का प्रतीक है। बल्कि समाज में सहानुभूति और पुनर्वास के महत्व को भी रेखांकित करता है। अदालत के इस रुख ने समाज में कमजोर वर्गों की मदद के लिए सरकार और अन्य संगठनों की जिम्मेदारी को उजागर किया है।

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