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बीहड़ का बागी: मज़दूर से अभिनेता बने दिलीप आर्या, काफी मुश्किलों में गुज़रा है जीवन, पढ़िए सफलता की कहानी

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मुम्बई, सितंबर 14, 2021। एक बच्चा जिसने बचपन में मज़दूरी कर अपनी ज़िंदगी गुज़ारी। काफ़ी मेहनत मशक़्क़त कर एक अलग पहचान बनाई। एक फिल्म़ में मुख्य अभिनेता का किरदार बख़ूबी निभाते हुए सर्वश्रेष्ट अभिनेता के अवार्ड से नवाज़ा जाए तो क्या आप यक़ीन करेंगे ? जी हां आज हम आपको एक ऐसी शख़्सियत से रूबरू करवाने जा रहे हैं। जिनका नाम दिलीप आर्या है। वन इंडिया हिंदी से बात करते हुए दिलीप आर्या ने अपनी संघर्ष की कहानी बयान की।

dilip arya

दिलीप के संघर्ष की कहानी
दिलीप आर्या एक ऐसा नाम है जो कि एक गांव से ताल्लुक़ रखते हैं। उनका जन्म 3 जुलाई 1980 में हुआ था। आज 21वीं सदी में युवा पीढ़ी के लिए मार्ग दर्शक एवं प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। दिलीप आर्या का वास्तविक नाम दिलीप कुमार है लेकिन उन्हें इंडस्ट्री में दिलीप आर्या के नाम से जाना जाता है। दिलीप आर्या फ़तेहपुर ज़िला के अमौली गांव, तहसील बिंदकी, उत्तर प्रदेश के निवासी हैं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही प्राइमरी विद्यालय में हुई। उनका बचपन मज़दूरी के पसीने में लिपटा परेशानी भरा था। इसके अलावा उनके सामने कोई और विकल्प भी तो नहीं था। फिर भी उन्होंने अपना हौसला बुलंद रखा आगे की पढ़ाई की, स्नातक और परास्नातक की डिग्रियां भी लीं।

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मज़दूरी कर गुज़ारी ज़िंदगी
सन् 1985 में दिलीप के बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया। घर के मुखिया के जाने के बाद पूरा परिवार बिखर सा गया था। ऐसी स्थिति में मां ने बच्चों की ख़ातिर मज़दूरी करना तय किया। तेज़ धूप में मां को खेतों में निराई, गुड़ाई करता देख, दिलीप और उसके बड़े भाई ने भी मज़दूरी करना शुरू कर दिया। क्योंकि दिलीप उम्र में छोटे थे उन्हें बड़ों के मुक़ाबले में देहाड़ी कम मिलती थी। काम में नुकसान ना हो इस वजह से उन्हें मज़दूरी पर कभी-कभी लोग नहीं ले जाते थे। दिलीप को इस बात का बहुत दुःख होता था और वो ज़ल्द से ज़ल्द बड़ा हो जाना चाहते थे ताकि अपने भाई और मां के साथ मिलकर घर का बोझ उठा सकें, उन दिनों मज़दूर की दिहाड़ी सिर्फ़ पाँच रूपये हुआ करती थी। दिलीप ज्यादा से ज्यादा समय तक काम पर लगे रहते थे। आज के दौंर में काम से छुट्टी मिले तो खुशी मिलती है लेकिन दिलीप के साथ ऐसा कभी नहीं रहा वह ज़्यादा से ज़्यादा काम करना चाहते थे।

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मज़दूरी करने के मिलते थे कुछ रूपये
दिलीप के पिता पेशा मेसन (राज मिस्त्री) का था। पिता गंगा सागर के निधन (1985) के बाद उनकी माता का पेशा कृषि श्रम बन गया। बड़े भाई अनीश कुमार ने बड़े होने का फ़र्ज़ बख़ूबी अंजाम दिया। पिता के निधन के बाद उन्होंने मज़दूरी करते हुए परिवार का ख़र्चा उठाया। दिलीप आर्या 3 भाई और 3 बहने हैं। दिलीप ने भी अपने परिवार के दो सिरों को पूरा करने के लिए 11 साल की उम्र से ही मज़दूरी करनी शुरू कर दी थी। 7 से 8 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद उन्हे कुछ रूपये मिलते थे जिससे परिवार की रोज़ी-रोटी चलती थी।

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बीहड़ का बागी वेब सीरीज़ से मिली पहचान
एक छोटे गांव से मुबंई जैसे शहर का रास्ता कितना मुश्किल भरा हो सकता है ये आप अंदाजा नहीं लगा सकते। दिलीप महानगरी मुम्बई तो पहुंच गए थे लेकिन उन्हें पता नहीं कि वह कहां रहेंगे , क्या खाएंगे और कैसा काम करेंगे ? आमतौर पर महानगर में ज़िंदगी गुज़ारने का बजट आम बजट से कहीं ज़्यादा होता है। दिलीप के इरादे मज़बूत और हौसले बुलंद थे, उन्हें जुनून था कि अपने ख़्वाब को सच कर दिखाना है। किसी भी हाल में सपने को साकार करना ही है। वह मुम्बई में करीब 15 साल तक सट्रगल करते रहे। कई जगह ऑडिशन वगैरह देने के बाद उन्हें बीहड़ का बाग़ी वेब सीरीज़ में लीड किरदार करने का मौक़ा मिला । उनकी वेब सीरीज़ बीहड़ का बागी ओटीटी प्लैट्फॉर्म पर सुपर डुपर हिट रही। इसके बाद उनका एक गाना शहीदी 15 अगस्त के मौक़े पर रीलीज़ हुआ उसे भी दर्शकों ने ख़ूब सराहा। इसके बाद दिलीप आर्या कामयाबी की सीढियां चढ़ते जा रहे हैं। आए दिन उन्हें कई कार्यक्रमों सम्मनित किया जा रहा है।

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English summary
Beehad ka Baaghi: Dilip Arya turned from laborer to an actor, life has gone through a lot of difficulties, read success story
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