Aurangzeb Tomb: तेज होती मांग के बीच क्या औरंगजेब की कब्र हटाना है इतना आसान? पढ़ें तमाम कानूनी दांव-पेच
Aurangzeb Tomb Controversy: महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में औरंगजेब की कब्र हटाने का मामला तूल पकड़ने लगा है। महाराष्ट्र में लगातार इसे लेकर अब प्रदर्शन और बयानबाजी बढ़ रही है। छत्रपति संभाजी पर आधारित बॉलीवुड फिल्म 'छावा' के रिलीज होने के बाद से यह मुद्दा और अधिक गर्मा गया है। हिंदूवादी संगठनों ने बाबरी मस्जिद के ध्वंस की तर्ज पर कारसेवा की चेतावनी दी है, जिसके चलते कब्र के बाहर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या औरंगजेब की कब्र को हटाना इतना आसान है? इसका जवाब आपको इस आर्टिकल में मिल जाएगा। कब्र हटाना इतना आसान नहीं है क्योंकि यह ना सिर्फ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्मारक है, बल्कि महाराष्ट्र वक्फ बोर्ड की संपत्ति भी मानी जाती है।

Aurangzeb Tomb: जानिए कानूनी और ऐतिहासिक पहलू
1951 में भारत सरकार ने औरंगाबाद के खुल्दाबाद में स्थित औरंगजेब की कब्र को Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains (AMASR) Act 1951 के तहत संरक्षित घोषित किया था। 1958 में संशोधित कानून के तहत इसे राष्ट्रीय महत्व के स्मारक की सूची में भी शामिल कर दिया गया। यह कानूनी संरक्षण इस स्मारक को हटाने की प्रक्रिया को अत्यंत जटिल बनाता है।
Aurangzeb Tomb: क्या कहता है कानून?
Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act (AMASR) के तहत सेक्शन 19 के अनुसार किसी भी संरक्षित स्मारक को तोड़ना, हटाना या नुकसान पहुंचाना गैरकानूनी है। यदि ऐसा किया जाता है तो सेक्शन 30 के तहत दोषी को दो साल की जेल और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।
हालांकि, सेक्शन 35 में प्रावधान है कि यदि कोई संरक्षित स्मारक राष्ट्रीय धरोहर का महत्व खो देता है, तो सरकार उसे संरक्षित सूची से हटा सकती है।
Aurangzeb Tomb: कैसे हट सकती है स्मारक?
संरक्षित सूची से हटाने की प्रक्रिया के तहत महाराष्ट्र सरकार को ASI या संस्कृति मंत्रालय को एक औपचारिक प्रस्ताव देना होगा। केंद्र सरकार विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर सकती है, जो स्मारक के महत्व की समीक्षा करेगी। समीक्षा के बाद, यदि सरकार निर्णय लेती है, तो एक आधिकारिक गजट नोटिफिकेशन जारी करके इसे सूची से हटाया जा सकता है।
Aurangzeb Tomb: वक्फ संपत्ति का भी पेंच
1973 में महाराष्ट्र वक्फ बोर्ड ने इसे वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया था। यदि ASI इसे अपनी संरक्षित सूची से हटा भी दे, तो इसका स्वामित्व पूरी तरह वक्फ बोर्ड के पास चला जाएगा। वक्फ कानून की धारा 51A और 104A के तहत महाराष्ट्र सरकार इसे सीधे तौर पर नष्ट नहीं कर सकती।
ऐसे में क्या हो सकते हैं संभावित विकल्प?
वक्फ बोर्ड की सहमति के तहत सरकार को वक्फ बोर्ड के दो-तिहाई सदस्यों की सहमति लेकर कब्र को हटाने की अनुमति लेनी होगी।
वहीं कानूनी चुनौतियो की बात करें तो सरकार को यह साबित करना होगा कि यह संपत्ति वक्फ बोर्ड की नहीं, बल्कि सरकारी जमीन पर बनी है। इसके लिए वक्फ ट्रिब्यूनल या न्यायालय में याचिका दाखिल करनी होगी।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हटाए गए स्मारक
1958 से 1978 के बीच 170 स्मारकों को ASI की सूची से हटाया गया, लेकिन पिछले 47 वर्षों में किसी भी स्मारक को हटाने की मिसाल नहीं मिली। 2023 में प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद ने भी ASI से राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की समीक्षा करने की सिफारिश की थी, लेकिन इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
कब्र को कानूनी रूप से हटाना आसान नहीं
महाराष्ट्र सरकार के लिए औरंगजेब की कब्र को कानूनी रूप से हटाना आसान नहीं है। ASI और वक्फ कानूनों के तहत इस पर कई प्रतिबंध लागू होते हैं। पहले इसे ASI की संरक्षित सूची से हटाना होगा और फिर वक्फ बोर्ड के स्वामित्व का मामला हल करना पड़ेगा। यह पूरी प्रक्रिया लंबी और जटिल होगी, जिसमें कई कानूनी बाधाएं सामने आ सकती हैं। ऐसे में औरंगजेब की कब्र को हटाना इतना आसान है तो इसका जवाब 'ना' में है।
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