"मिल नहीं चलेगी तो गन्ने का राम नाम सत्य है, यही इसका गत्य है", किसानों ने निकाली गन्ने की अंतिम यात्रा
नाराज किसानो ने आज एक अनोखे अंदाज में ही विरोध प्रदर्शन किया है। किसानों ने पहले तो गन्ने की अर्थी सजाई और फिर 'राम नाम सत्य' को नारे के रूप में इस्तेमाल करते हुए उसकी अंतिम यात्रा भी निकाली।

सरकार ने भले ही चीनी मिलों को 14 दिन के अंदर गन्ना मूल्य भुगतान करने के लिए आदेश दिया हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के महराजगंज ज़िले में जेएचवी शुगर मिल के जिम्मेदार बकाया गन्ना मूल्य के भुगतान पर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझ रहे हैं। यही कारण है कि इससे नाराज किसानो ने आज एक अनोखे अंदाज में ही विरोध प्रदर्शन किया है। किसानों ने पहले तो गन्ने की अर्थी सजाई और फिर 'राम नाम सत्य' को नारे के रूप में इस्तेमाल करते हुए उसकी अंतिम यात्रा भी निकाली। यही नहीं किसानो ने अंतिम यात्रा के बाद गन्नों का दाह संस्कार भी किया।
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गन्नों की अंतिम यात्रा, अनोखा प्रदर्शन
दरअसल, यूपी के जनपद महराजगंज की इकलौती गड़ौरा जेएचवी शुगर मिल पर अबतक किसानों का 17 करोड़ रूपये का गन्ना मूल्य का बकाया है, जिस वजह से मिल को गन्ना अलॉट नहीं हुआ है और मिल बंद है। वही महराजगंज से सटे जनपद कुशीनगर में कई मिलें संचालित हो रही हैं जिनकी दूरी 80 से 100 किमी है। ऊपर से इस मिल का अभी तक सेन्टर नहीं बना है और कांटा भी अबतक नहीं लगा है। जिससे किसानों के खेत खाली नहीं हुए है और गन्ने की फसल सूख रही है। साथ ही गेहूं की बुआई का सत्र भी पिछड़ता जा रहा है जिससे सभी किसान काफी नाराज हैं और अपने समस्या का समाधान चाहते हैं। इसलिए किसानों ने आज इस अनोखे अंदाज में विरोध प्रदर्शन किया है। बता दें कि किसानों ने पहले तो गन्ने की अर्थी सजाई और फिर 'राम नाम सत्य' को नारे के रूप में इस्तेमाल करते हुए उसकी अंतिम यात्रा भी निकाली। यही नहीं किसानो ने अंतिम यात्रा के बाद गन्नों का दाह संस्कार भी किया।

"चीनी का कटोरा" या किसानो के हाथ में कटोरा?
आपको बता दें कि अनुमानित हिसाब से बजहां झुलनीपुर क्षेत्र में करीब 1 लाख टन गन्ने का पैदावार होती है। इस क्षेत्र को चीनी का कटोरा और मिनी पंजाब के नाम से भी जाना जाता है लेकिन यहाँ के गन्ना किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। किसानों ने इसका विरोध करते हुए आज "मिल नहीं चलेगा तो गन्ने का राम नाम सत्य है, यही इसका गत्य है" जैसे स्लोगन बोले और अपनी नाराजगी व्यक्त की।
किसानों ने कहा है कि हमारे यहाँ गन्ना प्रमुख फसल है इसके अतिरिक्त हमारी भूमि पर अन्य फसलें या तो होती ही नहीं हैं और होती भी हैं तो उनकी पैदावार बहुत ही कम मात्रा में होती है। गन्ना बुआई कराते हैं तो कभी मिलें नहीं चलती तो कभी 80 किमी दूर सेंटर बना दिया जाता है। जिससे उन्हें गन्ने की ढुलाई महंगी पड़ती है और सड़क दुर्घटनाओं का सामना भी करना पड़ता है।

"यह गन्ने की नहीं अपितु गन्ना किसानों की अर्थी है"
किसानों का कहना है कि इतनी परेशानियों के बाद बची कुचि कसार तब पूरी हो जाती है जब समय से गन्ना मूल्य का भुकतान नहीं होता है। इस समस्या से हम ख़ासा परेशान हैं हमारे पास दूसरा कोई चारा नहीं है। उन्होंने आरोप लगते हुए यह भी कहा कि उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है, जिला प्रशासन मीलों पर दबाव बना नहीं पा रहा है। अपने हालत और दर्द को बयां करते हुए नम आँखों से उन्होंने यह भी कहा कि "हमारे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है, यह गन्ने की नहीं अपितु गन्ना किसानों की अर्थी है जिसे निकाला जा रहा है और दाह संस्कार किया जा रहा है। "
ताकि सिस्टम और सरकार की कुम्भ करणी नींद खुल सके और हमारे गन्ने की समस्या का कोई ठोस हल निकल सके।












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