Janmashtami: बाघों के गढ़ में स्थित श्री राम जानकी मंदिर केवल कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ही खुलता है, जानिए वजह

Janmashatami 2024: पूरी दुनिया में आज श्रीकृष्ण के जन्म की धूम मची हुई है। लोग श्रीकृष्ण के मंदिरों में दूर-दूर से जाकर पूजन अर्चन कर रहे हैं। ऐसा ही एक मंदिर मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में ताला गांव से लगभग 15 किलोमीटर दूर बांधवगढ़ के घने जंगल में पहाड़ के ऊपर बने कल्चुरी काल के किले के अंदर सैकड़ों वर्ष पुराना श्रीराम जानकी मंदिर है।

कभी बघेल शासकों की शिकारगाह रहा बांधवगढ़ का जंगल जब टाइगर रिजर्व के लिए सौंपा गया है। तब महाराजा मार्तंड सिंह ने सरकार के सामने शर्त रखी कि किले में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर लगने वाले मेले की परंपरा को समाप्त नहीं किया जाएगा। यही कारण है कि हर वर्ष एक दिन के लिए यहां वन्यजीव एक्ट शिथिल हो जाता है। 1970 के दशक में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व बनने के बाद इस क्षेत्र में स्वतंत्र विचरण पर विराम लगा था।

Shri Ram Janaki temple opens on Krishna Janmashtami Bandhavgarh temple opens for one day

इस राजघराने के वंशज करते हैं पूजा
परंपरानुसार मंदिर में प्रति वर्ष पर्व विशेष पर रीवा राज घराने (बघेल शासक) के वंशज पूजन करने के लिए आते हैं। बांधवगढ़ नेशनल पार्क की सीमा के भीतर स्थित मंदिर तक पहुंचने श्रद्धालुओं को 14 किलोमीटर पैदल यात्रा करनी पड़ती है।

मंदिर के गर्भगृह में विराजमान श्रीराम जानकी का सम्मोहित करने वाला श्रीविग्रह श्रद्धालुओं की सारी थकान दूर कर देती है। प्रति वर्ष यहां पूजन करने पहुंचने वाले बघेली शासकों के वंशज युवराज दिव्यराज सिंह ने बताया कि जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ था तभी से इस दिन विशेष यहां पूजन किया जा रहा है।

जानिए क्या है महत्व
रीवा राज्य का इतिहास नामक पुस्तक के लेखक यादवेंद्र सिंह परिहार के मुताबिक बांधवगढ़ में कलचुरियों का शासन 600-1200 ई.तक रहा। बघेली शासक व्याघ्रदेव के पुत्र कर्णदेव का विवाह कलचुरी शासक सोमदत्त की पुत्री पद्मकुंवरी से हुआ और दहेज में यह किला व आसपास का भूभाग मिला। बाद में बघेली शासकों ने किले की भीतर श्रीराम जानकी मंदिर का निर्माण कराया था।

भगवान श्रीराम का उपहार
बाघों की घनी आबादी के लिए मशहूर बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व के बीचों-बीच पहाड़ पर मौजूद बांधवगढ़ के ऐतिहासिक किले से जुड़ी एक पौराणिक गाथा है। भगवान श्रीराम ने वनवास से लौटने के बाद अपने भाई लक्षमण को ये किला उपहार में दिया था। इसीलिए इसका नाम बांधवगढ़ यानी भाई का किला रखा गया है। स्कंद पुराण और शिव संहिता में इस किले का वर्णन मिलता है।

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