देवलचौरी की अनूठी 'रामलीला', ब्रिटिशकाल में प्रारंभ हुई थी, 118 सालों से हो रहा मंचन
जैसीनगर के देवलचौरी गांव में एक ऐसी रामलीला का मंचन होता है, जिसमें राम, सीता और लक्ष्मण से लेकर रावण और विभीषण तक पात्रों के रुप में गांव के ही लोग अभिनय करते हैं। यह सिलसिला 118 साल से चलता आ रहा है।

देश का एक शहर ऐसा भी है जहां अंग्रेजों के समय शुरू की गई 'रामलीला' का मंचन आज भी होता आ रहा है। करीब 118 साल से लगातार हर साल बसंत पंचमी के दिन से इस अनोखी रामलीला का मंचन होता रहा है। रामलीला में सभी पात्र गांव के रहने वाले लोग ही होते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण व अन्य भाईयों के पात्रों का चयन गांव के बच्चों से किया जाता है। जबकि गांव के कोटवार को उनकी कदकाठी और आवाज के कारण रावण का पात्र मिलता है।
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जैसीनगर जनपद क्षेत्र के ग्राम देवलचौरी में करीब 118 वर्षों से रामलीला का मंचन हो रहा है। देवलचौरी ग्राम की रामलीला को बुंदेलखंड की सबसे पुरानी रामलीला भी कहा जाता है कैसे रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें रामायण की सभी पात्रों का अभिनय गांव के लोगों के द्वारा ही किया जाता है। रामलीला का आयोजन प्रति वर्ष बसंत पंचमी के दिन से शुरू होता है जो करीब 1 हफ्ते तक चलता है। रामलीला में सीता स्वयंवर धनुषयज्ञ का मंचन देखने के लिए ग्रामीणों में खास उत्साह होता है। बीते रोज धनुषयज्ञ का मंचन किया गया। इसमें रामस्वरुप ने जैसे ही शिव धनुष भंग किया, वैसे ही रामलीला मंचन मैदान जयश्री राम के जयघोष से गुंज उठा।
देवलचौरी सहित दूर-दूर से लोग रामलीला देखने आते हैं
देवलचौरी गांव के सरपंच पंडित मयंक तिवारी,एवं मोहित तिवारी बताते हैं कि सभी देवलचौरी वासियों के सहयोग से इस रामलीला का मंचन होता है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं जिसके कारण यह लोक परंपरा आज भी जीवित है। रामलीला का जीवंत मंचन देखने के लिए लोग इंतजार करते हैं। इस रामलीला को बुंदेलखंड की सबसे प्राचीन रामलीला कहा जाता है।












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