OPINION: एमपी में किसानों की तकदीर बदल रही खेतों की मशीनें, इस तरह नई क्रांति की लिखी इबारत

OPINION: मध्य प्रदेश ने कृषि क्षेत्र में मशीनों का उपयोग बढ़ाने के लिए एक मजबूत 3800 कस्टम हायरिंग केन्द्रों का मजबूत नेटवर्क तैयार कर खेती में बड़ा बदलाव ला दिया है। किसानों ने 2018-19 से अब तक पिछले पाँच वर्षों में 1 लाख 23 हजार ट्रेक्टर खरीदे हैं, जो प्रदेश में कृषि यंत्रीकरण की बढ़ती पसंद को दर्शाता है।

राज्य सरकार कस्टम हायरिंग केन्द्रों को प्रोत्साहित कर रही है, जिन्हें सहकारी समितियाँ, स्व-सहायता समूह, निजी और ग्रामीण उद्यमियों द्वारा संचालित किया जाता है, ताकि छोटे और मझौले किसानों को कृषि यंत्रों की सुविधा आसानी से मिल जाये।

बता दें कि मध्य प्रदेश ने वर्ष 2012 में कस्टम हायरिंग सेंटर की पहल की थी। इसे वर्ष 2014 में केंद्र सरकार ने अपनाया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों की जरूरत को देखते हुए कृषि मशीनरी के उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता को बारंबार दोहराया है।

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कृषि मेकेनाइजेशन के मॉडल
कस्टम हायरिंग सेंटर इस उददेश्य के साथ बनाए गए हैं कि वे 10 किलोमीटर के आस-पास के दायरे में करीब 300 किसानों को सेवाएँ दे सके। इन केन्द्रों की सेवाओं को ज्यादा से ज्यादा लाभकारी बनाने के लिए केंद्रों की संख्या को सीमित रखा गया है। मध्य प्रदेश में वर्तमान में 3800 किसान कस्टम हायरिंग सेंटर चला रहे हैं।

तमिलनाडु, उडीसा, और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी यही मॉडल अपनाने के लिए परीक्षण किया जा रहा है। मध्य प्रदेश ने कृषि अभियांत्रिकी संचालनालय के संचालकराजीव चौधरी के अनुसार फार्म मेकेनाइजेशन को कौशल विकास से जोड़ने की पहल की गई है।

कस्टम हायरिंग सेंटर से छोटे किसानों को किराये पर मशीन मिल जाती है, जिसके लिए भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है। राज्य सरकार 40.00 लाख से लेकर 2.50 करोड़ कीमत वाली नई और आधुनिक कृषि मशीनों के लिए हाई-टेक हब बना रही है। अब तक 85 गन्ना हार्वेस्टर्स के हब बन गए हैं।

ग्रामीण युवाओं के लिए नौकरी के अवसर
किसानों को कस्टम हायरिंग सेंटर का लाभ देने और किराये पर उपलब्ध कृषि मशीनों के बारे में जागरूक करने के लिए प्रदेश में एक सतत अभियान चल रहा है। कस्टम हायरिंग सेंटर पर किसानों के ज्ञान और कौशल में सुधार करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और कार्यशालाएँ आयोजित की जा रही हैं। कौशल विकास केंद्र भोपाल, जबलपुर, सतना, सागर, ग्वालियर, और इंदौर में चल रहे हैं। सभी भारतीय राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद से संबद्ध हैं। इन केंद्रों में ग्रामीण युवाओं के लिए ट्रेक्टर मैकेनिक और कंम्बाइन हार्वेस्टर ऑपरेटर कोर्स आयोजित किए जा रहे हैं। अब तक लगभग 4800 ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया गया है।

कृषि मेकेनाइजेशन से उत्पादन, लाभ और उत्पादकता में वृद्धि करने में मदद मिलती है। गलत धारणा है कि मेकेनाइजेशन से रोजगार के अवसरों में कमी आती है। इसके विपरीत रोज़गार की नई संभावनाएँ बनती हैं। महंगे कृषि उपकरणों को छोटे किसानों के लिए उपलब्ध कराने का प्रयास करने में राज्य सरकार ग्रामीण युवाओं को कस्टम हायरिंग केंद्र स्थापित करने में मदद कर रही है। यह प्रयास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'प्रति बूंद, अधिक फसल' पहल के साथ मेल खाता है, जिसका उद्देश्य उत्पादकता को बढ़ावा देना है। कस्टम हायरिंग सेंटर किराये पर मशीनों को उपयोग करने की अनुमति देते हैं, जिससे ग्रामीण युवाओं को अधिक से अधिक रोज़गार के अवसर दिए जा सकें। मशीनों से किसान के शारीरिक श्रम में बचत हो जाती है। मेकेनाइजेशन खेती की लागत को कम करता है और उत्पादकता बढ़ाता है। इससे किसान का लाभ बढ़ जाता है। ग्रामीण युवा स्नातक की डिग्री के साथ इस योजना का लाभ ले सकते हैं। इसमें कुल 25 लाख रूपये निवेश की आवश्यकता होती है। उन्हें केवल 5 लाख रुपए की मार्जिन राशि देना होती है। सरकार कुल लागत का 40% सब्सिडी देती है जो अधिकतम 10 लाख तक होती है। बाकी लागत बैंक ऋण से कवर हो जाती है।

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