अफ्रीकन चीता प्रोजेक्टः कूनो के बाद सागर के नौरादेही, मंदसौर के गांधी सागर में भी आएंगे चीते
सागर, 14 सितंबर। अफ्रीकन चीतों को मप्र के पालपुर कूनो में बसाने की तैयारियों के बीच सागर के नौरादेही वन्य प्राणी अभयारण्य और मंदसौर के गांधी सागर वन्य प्राणी अभयारण्य के लिए अच्छी और राहतभरी खबर सामने आई है। आगामी भविष्य में यहां भी अफ्रीकन चीतों को बसाने की योजना पर सरकार काम कर रही है। बात दें कि बीते रोज वन मंत्री विजय शाह सहित वन मंत्रालय के अधिकारियों ने इस आशय की जानकारी सार्वजनिक की है। पहले चरण में कूनों में चीते लाए जाएंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इनको पिंजरे से बाड़े में छोड़ेंगे।

नौरादेही में अफ्रीकन चीतों को बसाने 12 साल से सर्वे, तैयारिंयां चल रही थीं
मप्र में केंद्र और राज्य सरकार बीते 12 साल से सागर के नौरादेही वन्य प्राणी अभयारण्य में अफ्रीकन चीतों को बसाने के लिए मैदान सर्वे, प्रारंभिक तैयारियों में जुटी रहीं हैं। मप्र में चीतों को बसाने के लिए सबसे माकूल स्थान के रुप में नौरादेही अभयारण्य को माना गया था। यहां पर मैदानी तैयारियों को प्रारंभ भी कर दिया गया था। लेकिन बीच में यहां बाघ पुनस्र्थापन प्रोजेक्ट के चलते चीता प्रोजेक्ट को स्थगित कर दिया था। पहले चरण में चीतों श्योपुर के पालपुर कूनो नेशनल पार्क में बसाया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका से विशेषज्ञों की टीमें नौरादेही और गांधी सागर अभयारण्य का पूर्व में दौरा कर चुकी हैं।

नौरादेही में चीतों के लिए प्राकृतिक घास के मैदान, पहाड़ियां हैं
नौरादेही अभयारण्य प्रबंधन के अनुसार सागर, दमोह और नरसिंहपुर तक फैले इस अभयारण्य में अफ्रीकन चीतों के लिए वह सबकुछ है, जो उनके प्राकृतिक आवास में होना चाहिए। यहां घने जंगल, सैकड़ों हेक्टेयर में फैले घास के मैदान, पहाड़ी इलाके, भोजन के लिए भरपूर साधन मौजूद है। वन्य प्राणी विशेषज्ञों की जानकारी अनुसार चीते खेतों, ऊंचे घास के मैदान मैदानों, हल्के पहाड़ी, पथरीले इलाकों में आसानी से सर्वाइव करते हैं। नौरादेही में यह सबकुछ प्राकृतिक रुप से मौजूद है। इसके अलावा प्रबंधन ने बीते 10 सालों में यहां वह सबकुछ तैयारियां कर ली हैं जो चीतों के लिए आवश्यक बताई गई हैं। सबसे अहम रहवास और भोजन की व्यवस्था करना है, जिसे प्रबंधन ने पूरा कर लिया है।

मप्र में सबसे बढ़ा वन्य इलाका नौरादेही में ही है
नौरादेही अभयारण्य का कुल रकबा करीब 1197 वर्ग किलोमीटर है। इसमें सागर, दमोह और नरसिंहपुर जिले की सीमाएं लगती हैं। बाघ प्रोजेक्ट के कारण इसे टाइगर रिजर्व के लिए जो प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, उसमें 1230 वर्ग किलोमीटर से अधिक का इलाका चिन्हित किया गया है। जानकारी अनुसार मप्र में किसी भी अभयारण्य के पास इतना बड़ा इलाका नहीं है, जितना नौरादेही के पास उपलब्ध है। इस कारण यहां अफ्रीकन चीते आसानी से रह सकते हैं। कूनो में 20 से 22 चीतों को छोड़ने की व्यवस्था व रहवास और टेरेटरी की उपलब्ध बताई जा रही है, जबकि नौरादेही में उससे कई गुना अधिक चीते छोड़े जा सकते हैं।

अफ्रीका से 80 चीतें लाए जाने का प्लान है
वन मंत्री विजय शाह और वन मंत्रालय के अधिकारियों ने मीडिया को जानकारी दी है कि दक्षिण अफ्रीका ने करीब 80 चीते लाए जाने हैं। पहले और दूसरे चरण में 12 चीतें शिवपुरी के कूनो नेशनल पार्क में छोड़े जाएंगे। यहां इनका ब्रीडिंग सेंटर स्थापित किया जाएगा। इसके अलावा बाकी के चीतों को मप्र में सागर के नौरादेही अभयारण्य और मंदसौर के गांधी सागर वन्य प्राणी अभयारण्य में छोड़ जाएगा। यहां चीतों को बसाने के बाद अन्य अभयारण्य जिन्हें देहरादूर सहित देश-विदेश के विशेषज्ञों ने चीता प्रोजेक्ट के लिए माकूल माना था, वहां भी चीतें बसाए जा सकते हैं।

नौरादेही में बाघ पुनर्स्थापन सफल रहा है
नौरादेही अभयारण्य में 2006 से 08 के बीच बाघ विहीन हो गया था। इसके बाद यहां बाघ पुनस्र्थापन प्रोजेक्ट प्रारंभ किया गया था। प्रदेश के बांधवगढ़ और कान्हा से बाघ-बाघिन जिन्हें राधा-किशन नाम दिया गया था, उन्हें लाकर बसाया गया था। अभयारण्य के अंदर नौरादेही गांव के पास इन बाघों ने अपना बसेरा बना रखा है। इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। मप्र को टाइगर स्टेट का दर्जा बरकरार रखने में अब नौरादेही अभयारण्य का भी विशेष योगदान रहेगा। जिस तेजी से यहां बाघों की संख्या दर्जन भर पहुंची है, वे आंकडे़ उत्साहित करने वाले हैं।

नौरादेही में लाए जा सकते हैं चीते, प्राकृतिक रुप से अनुकूल है
नौरादेही अभयारण्य का कई दौर में विशेषज्ञों की टीम ने मैदानी सर्वे कर यहां किया गया है। अफ्रीकन चीतों को बसाने के लिए टीमों ने नौरादेही को अनुकूल पाया है। सरकार ने पहले चरण में कूनो को चुना है। भविष्य में हमारे यहां भी चीते लाए जाएंगे, इसकी भरपूर संभवना है। चीते कब आएंगे, कब यहां छोड़े जाएंगे यह सरकार और शासन तय करेगा। नौरादेही में पूर्व से ही चीतों को बसाने के लिए काफी तैयारियां की जा चुकी हैं। चीतों को सीधे जंगल में छोड़ा जाएगा या बाडे़ में रखा जाएगा। यह विशेषज्ञों का निर्णय रहेगा। अभयारण्य के अंदर से गांवों को भी विस्थापित किया जा चुका है।
- सुधांशु यादव, डीएफओ, नौरादेही सागर मप्र












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