MP: परीक्षा के दौरान 'नाटक' करने लगे विद्यार्थी! परीक्षकों ने बजाई ताली, बोले-आनंद आ गया
सागर, 26 सितंबर। आपने कहीं देखा है कि जिन छात्रों की परीक्षा चल रही हो वे मंच पर नाटक करते नजर आ रहे हों! नहीं देखा न? डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में आॅर्ट एंड परफाॅर्मिग विभाग के छात्र-छात्राओं का जब परीक्षा की बारी आई तो वे सभी मंच पर विभिन्न भेषभूषाओं में सजकर नाटक करते नजर आए। इनके नाटक को देखकर परीक्षक भी ताली बजाते और वाह-वाह करते दिख रहे थे। दरअसल इस विभाग में यह प्रायोगिक परीक्षा का पार्ट है। इसमें विद्यार्थियों को मंच पर अभिनय नाट्य और अभिनय कला का प्रदर्शन करना होता है, इसी आधार पर उन्हें नंबर दिए जाते हैं।

डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर के ललित कला एवं प्रदर्शनकारी कला विभाग में वार्षिक प्रायोगिक परीक्षा के द्वितीय एवं चतुर्थ सेमेस्टर के छात्रों द्वारा नाटक 'उरुभंग' की प्रस्तुति की गई। यह नाटक संस्कृत नाटककार भाष द्वारा रचित संस्कृत नाटक है, जिस का हिंदी अनुवाद भारत भूषण अग्रवाल ने किया हैं। नाटक का निर्देशन डॉ राकेश सोनी द्वारा किया गया है।

भीम-दुरुर्योधन युध्द के बाद दुर्योधन के चरित्र पर केंद्रित नाटक का मंचन
प्रयोगिक परीक्षा के दौरान प्रस्तुत किए गए नाटक का कथानक प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत पर आधारित है, जो भीम और दुर्योधन के युद्ध के दौरान व उसके बाद दुर्योधन के चरित्र पर केंद्रित है । जब भीम द्वारा दुर्योधन के जंघा पर गदा प्रहार से दुर्योधन की जंघा को नष्ट कर देते हैं। तब मृत्यु के अंतिम क्षणों में दुर्योधन अपने भूतकाल पर पछताता हैएऔर अपने परिवार के प्रति सहानुभूति का रुख लेता है तथा युद्ध की व्यर्थता का अनुभव करता है।
नाटक इग्गप्प हेगड़े से बताई सामाजिक कुरीतियों की पीड़ा
इसी प्रकार चतुर्थ सेमेस्टर के बच्चों ने नाटक 'इग्गप्प' हेगडे की प्रस्तुति दी। यह नाटक कोंकड़ी भाषा के लेखक वेंकट रमन के उपन्यास का नाट्य रूपांतरण है । जिसका हिंदी अनुवाद शाहवालू व विपिन त्यागी द्वारा किया गया है। नाटक का निर्देशन डॉ राकेश सोनी द्वारा किया गया। नाटक के माध्यम से समाज में व्याप्त बाल विवाह जैसी विषम कुरीतियों के बीच नारी की दशा का चित्रण किया गया। जिसमें 13 वर्षीय सावित्री का विवाह 60 वर्षीय इग्गप्प हेगड़े नाम के एक वृद्ध व्यक्ति से कर दिया जाता है। और विवाह के कुछ ही साल बाद इग्गप का देहांत हो जाता है। जिसके पश्चात सावित्री को जीवन भर विकट यातनाएं सहनी पड़ती है।












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