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MP News: दमोह में कुपोषण की स्थिति गंभीर, अतिकुपोषित बच्ची की मौत के बाद हालात पर सवाल

दमोह जिले में कुपोषण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है और इस स्थिति ने एक बार फिर गंभीर मोड़ ले लिया है। हाल ही में एक अतिकुपोषित बच्ची को गंभीर हालत में जिला अस्पताल से जबलपुर रेफर किया गया, लेकिन इलाज शुरू होने से पहले ही उसकी मौत हो गई।

यह घटना इस बात की गवाह है कि जिले में कुपोषण की समस्या पर अभी भी नियंत्रण नहीं पाया जा सका है।

Malnutrition situation serious in Damoh questions on situation after death of malnourished girl

घटना की जानकारी

यह मामला हटा ब्लॉक के रनेह के पास बिला गांव की दो माह की बच्ची राशि का है। बच्ची अतिकुपोषित थी और उसका दूध पीना भी बंद हो गया था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए परिजनों ने बच्ची का इलाज कराने के बजाय झाड़-फूंक कराने का फैसला किया। इस दौरान, परिजनों ने जिला अस्पताल में एक ओझा को बुलवाया, जिसने बच्ची के माथे पर भवूति लगाकर झाड़-फूंक की प्रक्रिया की।

इस दौरान अस्पताल के स्टाफ और लोगों की नजरों से बचते हुए ओझा ने यह प्रक्रिया पूरी की और इसके बाद बच्ची को जबलपुर रेफर किया गया। हालांकि, जबलपुर पहुंचने से पहले ही बच्ची की मौत हो गई।

जिले में कुपोषण की स्थिति

दमोह जिले में कुपोषण की समस्या बहुत गंभीर है। महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जिले में 2559 अतिकुपोषित और 7939 कुपोषित बच्चे दर्ज हैं। तेंदूखेड़ा ब्लॉक में सबसे अधिक 486 अतिकुपोषित बच्चे पाए गए हैं।

पोषण सहायता के प्रयास

आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से पोषण आहार के लिए हर माह लगभग 3 करोड़ रुपए का बजट खर्च किया जा रहा है, फिर भी कुपोषण में कोई कमी देखने को नहीं मिल रही है। इसके बावजूद, हालात की गंभीरता को देखते हुए यह सवाल उठता है कि इस बजट का सही तरीके से उपयोग क्यों नहीं हो रहा है।

मामले पर अधिकारी की प्रतिक्रिया

अधिकारी ने बताया कि बच्ची की स्थिति बेहद गंभीर थी, और कुपोषण के साथ-साथ उसकी हार्ट में भी समस्या थी। हार्ट में छेद होने के कारण उसे जबलपुर रेफर किया गया था। हालांकि, समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण बच्ची की जान नहीं बचाई जा सकी।

आगे की कार्रवाई और सुधार की आवश्यकता

इस घटना ने जिले में कुपोषण के खिलाफ चलाए जा रहे प्रयासों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाया है। यह आवश्यक है कि कुपोषण के मामलों में तेजी से कार्रवाई की जाए और पोषण सहायता की प्रक्रिया में सुधार किया जाए। इसके साथ ही, झाड़-फूंक और गैर-पारंपरिक उपचार विधियों पर कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।

जिले की स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं को मिलकर काम करने की जरूरत है ताकि बच्चों के जीवन की रक्षा की जा सके और कुपोषण की समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सके।

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