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मध्य प्रदेश चुनाव में बीजेपी को अपने दिग्गज नेताओं पर क्यों लगाना पड़ा दांव?

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों को लेकर बीजेपी ने अबतक जो 230 सीटों के लिए 76 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है, उसमें कुछ नाम चौंकाने वाले हैं और पार्टी की बहुत ही सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा लग रहे हैं।

सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भोपाल रैली के कुछ घंटों बाद 39 उम्मीदवारों की जो दूसरी लिस्ट जारी हुई है, उसमें काफी कुछ संकेत और संदेश छिपा हुआ है। सबसे बड़ी बात है कि पार्टी के अबतक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र की घोषणा दूसरी लिस्ट में भी नहीं की गई है।

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मुख्यमंत्री की रेस के लिए मैदान खुला छोड़ने की रणनीति!
बीजेपी के उम्मीदवारों की अबतक की लिस्ट से संकेत मिलता है कि करीब 20 वर्षों के उसके कार्यकाल से पैदा हुई एंटी-इंकंबेंसी से निपटना उसका पहला लक्ष्य है। दूसरा, पार्टी ने जिस तरह से तीन केंद्रीय मंत्रियों, चार सांसदों और पार्टी के एक दिग्गज महासचिव को टिकट दिया है, उससे पता चलता है कि पार्टी चुनाव को पूरी गंभीरता से लड़ना चाहती है; और वरिष्ठ क्षेत्रीय नेताओं की आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए मुख्यमंत्री कुर्सी की रेस के लिए भी मैदान खुला रखना चाहती है।

सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने की तैयारी
बीजेपी की अभी तक की लिस्ट से यह साफ लग रहा है कि इस बार मध्य प्रदेश विधानसभा का चुनाव सीएम शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रह्लाद सिंह पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते के साथ-साथ चार सांसदों और पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी और प्रधानमंत्री मोदी उसके चुनाव अभियान का मुख्य चेहरा होंगे। पार्टी ने दिग्गज नेताओं को चुनाव मैदान में उतारने के साथ ही, उनके माध्यम से सभी जातियों, क्षेत्रीय संतुलन को भी बनाए रखने की कोशिशों में जुटी हुई है।

कमजोर सीटों को मजबूत करने की कोशिश
बीजेपी ने आठ दिग्गजों को सोमवार को टिकट दिया है, उनमें से चार पहले विधायक भी रह चुके हैं। ये सारे मंजे हुए नेता होने के साथ-साथ अपने-अपने क्षेत्रों में काफी प्रभावी भी माने जाते हैं। इन नेताओं को टिकट देकर पार्टी सिर्फ कमजोर सीटों का परिणाम ही अपने पक्ष में ही नहीं करना चाहती है, बल्कि इन धुरंधर नेताओं की वजह से बनने वाले जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण का फायदा आसपास की सीटों पर भी लेने की उम्मीद लेकर चल रही है।

दरअसल, बीजेपी राज्य में 5 सितंबर से ही जन आशीर्वाद यात्रा निकाल रही थी। पार्टी ने उन क्षेत्रों पर ज्यादा फोकस किया, जो सीटें अभी कांग्रेस के पास हैं। लेकिन, पार्टी की यात्रा को वहां उतना जनसमर्थन नहीं मिला, जितना कि बीजेपी विधायकों वाले क्षेत्रों में मिला। दिग्गजों को उतारने के फैसले में इन तथ्यों ने भी अहम भूमिका निभाई है।

बीजेपी की आंतरिक राजनीति की भी बड़ी भूमिका
मसलन, दिमनी विधानसभा क्षेत्र की बात करें जहां से केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को उम्मीदवार बनाया गया है। वहां पर मौजूदा कांग्रेस विधायक राजेंद्र सिंह तोमर ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक गिरिराज डंडोतिया को उपचुनाव हरा दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो सिंधिया समर्थक के चुनाव लड़ने की वजह से वहां स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं में बड़ी नाराजगी थी। इसी नाराजगी को देखते हुए पार्टी ने वरिष्ठ नेता को यहां से उम्मीदवार बनाने का फैसला किया है।

थोड़ी कोशिश से चुनाव की हवा बदलने की कोशिश
इसके अलावा वरिष्ठ नेताओं को विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार बनाने की एक बड़ी वजह यह भी है कि ओपिनियन पोल और पार्टी के इंटरनल सर्वे में भी बीजेपी को बहुमत से कुछ सीटें कम मिलने का अनुमान जताया जा रहा है। 2018 के विधानसभा चुनावों के नतीजे देखने के बाद सत्ताधारी पार्टी अबकी बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। इसलिए उसने ऐसी सीटों पर वरिष्ठ नेताओं को उतारा है, जहां पर थोड़ी कोशिशों से चुनावों का रुख बदला जा सकता है। (इनपुट-वनइंडिया के सीनियर रिपोर्टर-लक्ष्मी नारायण मालवीय)

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