कूनो चीता प्रोजेक्टः ‘सियाया’ ने बाड़े में 4 शावकों को जन्म देकर 410 साल का "मिथक" तोड़ा
भारत की धरती पर 1613 में मुगल सम्राट जहांगीर के समय पिंजरे में चीतों का जन्म हुआ था, उसके बाद अब जाकर कूनों में मादा चीता सियाया ने बाड़े में शावकों को जन्म दिया है।

भारत की धरती पर एमपी के कूनो नेशनल पार्क में दक्षिण अफ्रीकी देश नामीबिया से आई मादा चीता सियाया ने 4 शवकों को जन्म देकर करीब 410 साल पुराना एक मिथक तोड़ डाला है। दरअसल सियाया ने अपने शावकों को कूनों के बाड़े में जन्म दिया है। भारत में एक मिथक माना जाता है कि चीते पिंजरे या बाड़े में शावकों को जन्म नहीं देते हैं।
केंद्र सरकारें बीते दो 25 साल से भारत की धरती पर अफ्रीकन चीतों को बसाने चीता प्रोजेक्ट पर काम कर रहीं थी। बीते सितंबर में जाकर यह चीता प्रोजेक्ट साकार हो सका है। सितंबर में भारत की धरती पर चीतों ने कदम रखा तो कई सवाल खड़े किए जा रहे थे। चीतों से जुड़े वन्य प्राणी विशेषज्ञ मान रहे थे कि मादा चीता सियाया को यदि पिंजरे या बाड़े में रखा गया तो वह अपने शावकों को आसानी से जन्म नहीं दे सकेगी। वे बाड़े में चीतों की मेटिंग, इनकी ब्रीडिंग को लेकर भी सवाल उठा रहे थे। कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि देश में आखिरी बार 1613 में मादा चीता ने पिंजरे में शावकों को जन्म दिया था, उसके बाद से कभी यहां पिंजरे या बाड़े में किसी चीता ने बच्चों को जन्म नहीं दिया था।

'सियाया' ने तोड़े मिथक, बदली विशेषज्ञों की सोच
नामीबियाई मादा चीता जब भारत लाई गई और पीएम मोदी ने उसे बाड़े में छोड़ा था। दिसंबर के बाद विशेषज्ञों ने उसके बड़े हुए पेट और उसकी एक्टिविटी को देखकर उसके गर्भवती होने की उम्मीद जगी थी। विशेषज्ञों ने परीक्षण किया तो वह गर्भवती ही थी। इस कारण उसे बड़े बाड़े में ही रखा गया था। सियाया ने बीते दिनों बाड़े में शावकों को जन्म देकर यह मिथक तोड़ा है।

मुगल शासक जहांगीर के समय 1613 में आखिरी दफा पिंजरे में जन्मे थे चीते
कूनो नेशनल पार्क के फील्ड डायरेक्टर व सीसीएफ उत्तम कुमार शर्मा ने स्थानीय मीडिया से जानकारी साझा करते हुए बताया कि भारत की धरती पर पिंजरे में आखिरी दफा 1613 में मादा चीते ने शावकों को जन्म दिया था। उसके बाद से लेकर आखिरी चीते के खत्म होने तक कभी चीतों का जन्म पिंजरे में नहीं हुआ है। हालांकि 70 बाद भारत में चीते आने के चंद महीनों बाद ही कूनों के बाड़े में मादा चीता सियाया ने बाड़े में शावकों को जन्म देकर इस मिथक को तोड़ दिया है। यह चीता प्रोजेक्ट के लिए शुभ संकेत है।
मानवीय हस्तक्षेप से दूर रखा, तनाव मुक्त रखा
सीसीएफ उत्तम कुमार शर्मा के अनुसार 4 शताब्दी बाद मिटक इस कारण टूट पाया क्योंकि कूनों में चीतों के आने के बाद उन्हें तनावमुक्त रखने का सबसे अधिक प्रयास किया गया है। खास तौर से गर्भवती सियाया को मानवीय एक्टिविटी से मुक्त, मानवीय हस्तक्षेप से दूर रखा गया। उसे तनाव मुक्त माहौल दिया गया था। प्रबंधन ने सख्ती से सियाया के पास सिर्फ एक-दो लोगों के अलावा किसी को नहीं जाने दिया गया। माॅनिटरिंग टीम भी 24 घंटे में केवल एक दफा ही इनको फिजिकली देखती है। ताकि ये तनाव फ्री रह सकें। सियाया शावकों के जन्म के बाद उन्हें करीब 6 से 8 हफ्तों बाद बाहर निकालेगी।












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