Holi 2023: हथखोय में अभिशप्त है होली, दहन किया तो गांव में लग जाती है आग, कुलदेवी होती हैं नाराज
मप्र के सागर जिले में देवरी ब्लॉक का छोटा सा गांव हथखोय होली के रंग, गुलाल, उल्लास से कोसों दूर हैं। यहां होली नहीं जलाते न हीं होली खेलते हैं। गांव के बुजुर्गों के अनुसार होलिका दहन से गांव की कुलदेवी झारखंडन माता नाराज

Holi 2023: होलिका दहन और रंग-गुलाल से होली खेलने से क्या अनिष्ठ हो सकता है? क्या होली भी अभिशप्त हो सकती है? मप्र के सागर जिले का हथखोय गांव यह बात 100 फीसदी सच है। इस गांव में होलिका दहन नहीं किया जा सकता, न ही कोई होली खेल सकता है। कहते हैं यदि इस गांव में होली जली तो पूरा गांव जलकर स्वाहा हो जाएगा... मान्यता है कि होलिका दहन करने से गांव की कुलदेवरी 'झारखंडन माता' नाराज हो जाती हैं। उनके प्रकोप से बचने के लिए बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक कोई होली नहीं मनाता।

देवरी का हथखोय गांव इकलौता ऐसा गांव हैं जहां पर लोग होलिका दहन तो ठीक एक दूसरे को रंग गुलाल तक नहीं लगाते है। अगर वह ऐसा करते है तो उनके गांव में विराजी 'देवी' नाराज हो जाती हैं। माता किसी से रुष्ट ना हो उनकी कृपा सभी पर बनी रहे, इसलिए ग्रामीण कई सालों से यहां पर होली नहीं जलाते। अब यहां की परंपरा में भी शामिल हो गया है।
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होली जलाई तो पूरे गांव में आग लग गई थी
जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर देवरी ब्लॉक में हथखोय गांव स्थित है गांव के लोग बताते है कि जब से वह पैदा हुए हैं तब से एक बार भी होली जलते नहीं देखी है। बड़े बुजुर्ग बताते थे कि एक बार कभी परंपरा को तोड़कर होली जलाने का प्रयास किया था, लेकिन पूरे गांव में आग लग गई थी ऊंची-ऊंची लपटे उठने लगी थी। जिसके बाद ग्रामीणों में अफरा-तफरी का माहौल था फिर लोगों को समझ आया कि झारखंडन माता नाराज हो गई हैं। लोगों ने जाकर माता के देहरी पर माता टेका, मिन्नतें की और प्रार्थना कर आगे से ऐसा ना करने का संकल्प लिया, जिसके बाद आग बुझ गई थी। उसके बाद से ना तो ग्रामीणों ने कभी होली जलाने का प्रयास किया और ना ही रंग उत्सव मनाया। फिर ना ही इसके बाद कभी इस प्रकार की कोई आपदा गांव में आई है। इसके पीछे ग्रामीण माता की ही कृपा बताते हैं। वे कहते है की मां झारखंडन गांव की और गांव वालों की रक्षा करती हैं।
नवरात्र में लगता है मेला
हथखोय में होली को छोड़कर बाकी के सारे त्योहार, पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं। गांव में झारखंडन माता का प्राचीन मंदिर बना है। मंदिर में विराजी माता की अष्टभुजाधारी प्रतिमा को गांव की कुलदेवी का स्वरुप माना जाता है। गांव वाले कुलदेवी के रूप में ही उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। नवरात्रि के समय यहां पर बड़ा मेला भी आयोजित किया जाता है।












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