भोपाल पहुंच MP पुलिस को गीता ने बोला थैंक्यू, जानें पाकिस्तान से वापसी के बाद कैसे मिला परिवार

Geeta met her family after 22 years and thanks to MP police

भोपाल, 29 जून। पाकिस्तान से 2015 में भारत लौटने के बाद आखिरकार महाराष्ट्र के परभड़ी की रहने वाली गीता को परिवार मिल गया है। गीता को परिवार से मिलाने में मध्य प्रदेश की पुलिस और एनजीओ ने काफी मदद की। क्योंकि गीता बोल भी नहीं सकती थी और साइन लैंग्वेज को भी नहीं समझ पाती थी। ऐसे में इंदौर की संस्था पहल फाउंडेशन द्वारा गीता को साइन लैंग्वेज पढ़ाया गया और परिवार से मिलाया गया। परिवार से मिलाने में मदद करने वालों को थैंक्यू बोलने के लिए गीता मंगलवार को भोपाल पहुंची और सभी का शुक्रिया किया। इस दौरान जीआरपी पुलिस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की।

Geeta

MP पुलिस और जीआरपी को कहा थैंक्यू
महेंद्र सिंह सिकरवार, आईजी रेल मध्यप्रदेश के मुताबिक गीता की मां अपनी बेटी से मिलकर बहुत खुश है और उसकी एक बड़ी बहन भी है, जिसकी शादी हो चुकी है। गीता अभी उसके परिवार के भी सभी लोगों से मिलकर आई है। महेंद्र सिंह सिकरवार, आईजी रेल मध्यप्रदेश ने बताया कि आज गीता की मां और गीता ने मध्य प्रदेश पुलिस और जीआरपी पुलिस की काफी तारीफ की और धन्यवाद का पत्र भी दिया। इसके अलावा गीता के परिजनों ने मीडिया को भी इस पूरे मामले में बहुत धन्यवाद ज्ञापित किया है।

वतन वापसी के बाद ऐसे ढूंढ़ा गया परिवार को
वतन वापसी के बाद गीता का सबसे संघर्ष पूर्ण सफर था। गीता के मां बाप और परिजनों को ढूंढना इतना आसान नहीं था, क्योंकि गीता को पढ़ना-लिखना, बोलना या फिर साइन लैंग्वेज भी समझना नहीं आता था। हालांकि, जीआरपी को गीता ने इशारे में जरूर बताया था कि वह जहां रहती थी वहां पास में रेलवे पटरी थी और वहां एक अस्पताल भी था। इन्हीं दो निशानियों के आधार पर पूरे हिंदुस्तान में गीता के परिजनों को ढूंढने का सिलसिला शुरू हुआ देश के विभिन्न हिस्सों में विशाखापट्टनम से लेकर साउथ तक इस तरह की जगहों की खोज की गई।

इसके बाद इंदौर कलेक्टर ने फाउंडेशन के सदस्यों के साथ गीता को उन स्थानों पर भेजा, जहां गीता के घरवालों के मिलने की उम्मीद थी। इसी बीच जीआरपी द्वारा गीता के पोस्टर छपवा कर गीता के परिजनों को ढूंढने का काम शुरू किया गया और लगभग डेढ़ से 2 साल गीता के परिवार को ढूंढ लिया गया।

ढू़ंढ़ने में सचखंड एक्सप्रेस भी बनी बड़ी क्लू
वर्ष 2000 में गीता जब बहुत छोटी थी और वह घर से गायब हुई, तब उसे सिर्फ इतना याद था कि वह जिस ट्रेन में बैठ कर गई थी उसमें डीजल इंजन लगता था। गीता ने जब साइन लैंग्वेज में जीआरपी को यह बताई तो जीआरपी सीधा सचखंड एक्सप्रेस को टार्गेट करने लगी। इसी गाड़ी से गीता अमृतसर पहुंची थी और वहां से समझौता एक्सप्रेस मैं बैठकर वह पाकिस्तान पहुंच गई थी।

पाकिस्तान की सामाजिक संस्थाओं ने भी रखा ध्यान
पाकिस्तान में गीता का बहुत ध्यान रखा गया। गीता को वहां जिस संस्था में गीता को रखा गया, पूजन करने के लिए मंदिर भी बनवा कर दिया गया। गीता को दिवंगत विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की मदद से 2015 में भारत लाया गया था। गीता का असली नाम राधा है। वह साइन लैंग्वेज सीख कर अपने जैसे मूक बधिर बच्चों को पढ़ाना चाहती है। साथ ही वह टीचर बनकर आत्मनिर्भर भी बनना चाहती है।

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