MP News: मऊगंज के गडरा गांव के एक घर में फंदे से झूलते मिले तीन शव, आंसुओं के बीच उठे पुलिस पर सवाल
Mauganj News: मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के गडरा गांव में शुक्रवार की सुबह एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने हर किसी के दिल को दहला दिया। एक घर से तेज बदबू की शिकायत पर पहुंची पुलिस ने दरवाजा खोला, तो अंदर का दृश्य देखकर सभी सन्न रह गए।
तीन शव-एक पिता और उसके दो मासूम बच्चों के-फंदे से झूल रहे थे। यह गांव वही है, जहां पिछले महीने हिंसा और हत्या की आग भड़की थी। अब इस नई त्रासदी ने गांव के घावों को फिर से कुरेद दिया है। क्या यह हादसा पुलिस की सख्ती का नतीजा है, या तनाव से भरी जिंदगी का अंत? यह सवाल हर आंख में आंसुओं के साथ गूंज रहा है।

बदबू ने खोला दर्दनाक राज
गडरा गांव की साकेत बस्ती में औसेरी साकेत के घर से सुबह से तेज बदबू आ रही थी। पड़ोसियों ने खिड़की से झांककर देखा, लेकिन दरवाजा अंदर से बंद था। सहमे हुए लोगों ने पुलिस को बुलाया। मौके पर पहुंची पुलिस ने ग्रामीणों की मदद से गेट खोला, तो अंदर औसेरी साकेत, उनकी 11 साल की बेटी मीनाक्षी और 8 साल के बेटे अमन के शव फंदे से लटके मिले। रीवा से फॉरेंसिक टीम और अतिरिक्त पुलिस बल तुरंत बुलाया गया। कलेक्टर संजय कुमार जैन और SP दिलीप कुमार सोनी भी मौके पर पहुंचे, लेकिन इस दुखद दृश्य ने सबको झकझोर कर रख दिया।
एक परिवार का अंत: तनाव की कहानी
रीवा IG गौरव राजपूत ने बताया कि औसेरी की पहली पत्नी की मौत हो चुकी थी। दूसरी पत्नी से उनका अक्सर विवाद होता था, जिसके चलते वह तनाव में रहते थे। लेकिन परिजनों की कहानी कुछ और कहती है। औसेरी की भाभी कुसुमकली ने रोते हुए कहा, "जेठ और उनके बच्चों के शव मिले हैं। हम दो किलोमीटर दूर रहते हैं। 15 मार्च के बवाल के बाद से गांव में पुलिस का डर था। कोई बाहर नहीं निकलता था। पुलिस घरों में घुसकर मारती थी, महिलाओं को भी नहीं बख्शा। जेठ से भी मारपीट हुई थी। उसी दिन से उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया था।" परिजनों का दावा है कि यह आत्महत्या नहीं, बल्कि पुलिस की ज्यादती का नतीजा है।
15 मार्च का बवाल: गांव का जख्म
यह वही गडरा गांव है, जहां 15 मार्च को हिंसा ने कोहराम मचाया था। उस दिन सनी द्विवेदी नाम के युवक को आदिवासियों ने पीट-पीटकर मार डाला था। उसे बचाने गई पुलिस पर भी हमला हुआ, जिसमें ASI रामचरण गौतम शहीद हो गए और 15 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए। तब से गांव में धारा 144 लागू है और पुलिस कैंप तैनात हैं। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस की मौजूदगी सुरक्षा नहीं, बल्कि डर का सबब बनी। कुसुमकली ने कहा, "पुलिस ने जेठ को पीटा था। वह डर से घर में छिप गए थे। उनके बच्चे भी सहमे हुए थे। क्या यह सब उसी का नतीजा नहीं?"
रेस्क्यू से पोस्टमॉर्टम तक
गुरुवार को हुए इस हादसे की सूचना देर शाम पुलिस तक पहुंची। तीन घंटे के रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद शवों को बाहर निकाला गया। रात 12 बजे तक जिला अस्पताल में पोस्टमॉर्टम चला। शुक्रवार सुबह शवों को गांव लाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। एक मासूम बेटी और बेटे की लाशें देखकर हर कोई फफक पड़ा। अब इन शवों का अंतिम संस्कार होना है, लेकिन गांव का दर्द खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।
प्रशासन का जवाब: "पुलिस दोषी नहीं"
SP दिलीप सोनी ने कहा, "घर से बदबू की सूचना मिली थी। अंदर औसेरी साकेत और उनके दो बच्चों के शव मिले। पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया है। FSL टीम जांच कर रही है। घटना का कारण पता लगाया जा रहा है। पुलिस का इससे कोई लेना-देना नहीं है।" लेकिन परिजनों के आरोपों ने इस बयान पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गांव में तनाव को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है।
आंसुओं में डूबा गांव
कोंडावत की त्रासदी के बाद अब गडरा की यह घटना मध्य प्रदेश में चर्चा का विषय बन गई है। एक पड़ोसी ने कहा, "औसेरी अपने बच्चों के साथ अकेले रहते थे। वह शांत थे, लेकिन बवाल के बाद से डरे हुए थे। उनके बच्चों की हंसी अब कभी नहीं सुनाई देगी।" गांव की गलियों में सन्नाटा है, और हर चेहरा उदास। सोशल मीडिया पर भी लोग इस दुख को बयां कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, "गडरा में पहले हत्या, अब यह। क्या गांव का हर घर दर्द की कहानी बनेगा?"
सवालों का सैलाब
प्रशासन ने मृतकों के परिजनों को 4-4 लाख रुपये की मदद का ऐलान किया है, लेकिन यह रकम उस दर्द को कम नहीं कर सकती, जो गांव झेल रहा है। क्या पुलिस की सख्ती ने एक परिवार को इस कदम तक पहुंचाया? या यह तनाव और अकेलेपन का नतीजा था? ये सवाल अब जांच की आग में तप रहे हैं। गडरा की यह त्रासदी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चीख है-जो इंसाफ और संवेदना की गुहार लगा रही है।
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