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Dr. Gour University: 76 साल पुराने विवि में लागू था लोकतंत्र, कुलपति का भी चुनाव होता था

Dr. Harisingh Gour Central University आजादी से पूर्व सागर विश्वविद्यालय में लोकतांत्रित व्यवस्था लागू कर दी गई थी। देश में यह इकलौता संस्थान था, जिसमें कुलपति की नियुक्ति नहीं होती थी, बल्कि यहां निर्वाचन के माध्यम से कुलपति का चुनाव होता था। बात दें कि मप्र के मुख्मंत्री रहे द्वारिका प्रसाद मिश्र जिन्हें राजनीति का चाणक्य कहा जाता है, वे सागर विवि के कुलपति का चुनाव हार गए थे। विवि के संस्थापक व महान शिक्षाविद डॉ. हरीसिंह गौर ने 1946 में नागपुर में सागर विवि का एक्ट बनाया था।

Dr. Harisingh Gour Central University

हिन्दुस्तान की संविधान निर्माण समिति के सदस्य रहे डॉ. हरीसिंह गौर दशकों आगे की दूरगामी सोच रखते थे। 1946 में मप्र के हृदय स्थल सागर में विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। इसका एक्ट उन्होंने 1946 में नागपुर में बनाया था। डॉ. गौर ने इसमें प्रावधान किया था कि कुलपति का चयन सरकार नहीं बल्कि विवि के तहत आने वले काउंसिल मेंबर करते थे। देश के 16 वें और संयुक्त प्रांत एवं बिदर्भ सीपी एंड बरार के दूसरे विश्वविद्यालय के रूप में दुनिया में अपनी पहचान स्थापित करने वाले डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय की अलग ही ख्याति रही है। यहां कुलपति के पद का महत्व इतना था कि 952 में देश के ख्यात राजनीतिज्ञ और संयुक्त प्रांत के गृहमंत्री रहे एवं राजनीति में चाणक्य कहे जाने वाले डीपी मिश्र भी कुलपति पद का चुनाव हार गए थे। बता दें कि संविधान निर्माण समिति के सदस्य रहे और विवि के संस्थापक डॉ गौर ने अपने जीवन की पूंजी को लगाकर जो विवि को किया था स्थापित, वह भी प्रजातांत्रिक मूल्यों पर चलता रहा।

Dr. Harisingh Gour Central University

काउंसर सदस्यों द्वारा कुलपति का चुनाव से चयन होता था
डॉ. गौर के संस्थापक कुलपति रहने के बाद यहां कुलपति पद का चयन सरकार द्वारा नहीं बल्कि विवि के काउंसलर सदस्यों व कुछ अन्य तय सदस्यों द्वारा किया जाता था। हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. सुरेश आचार्य बताते हैं कि तब सागर विवि के कुलपति का पद इतना अहम माना जाता था कि उसमें कुलपति बनने आजादी पूर्व की सीपी एंड बरार सरकार में गृहमंत्री रहे समाजवादी नेता डीपी मिश्र भी 1952 में चुना लड़ा था। वे राजनीतिक को लेकर काफी संजीदा थे, लेकिन कुलपति पद का चुनाव हार गए थे। उस दौरान उन्हें प्रो. आरपी त्रिपाठी ने हरा दिया था। हालांकि 1957 में फिर हुए चुनाव में डॉ. मिश्र कुलपति चुने गए। कुलपति रहने के बाद ही वह मप्र के मुख्यमंत्री भी बनें थे। उल्लेखनीय है कि मिश्र के कुलपति कार्यकाल के दौरान ही पथरिया जाट पर स्थित डॉ. गौर विवि का विस्तृत स्वरुप अस्तित्व में आया था।

1973 में सरकार ने विधासभा में बिल सागर एक्ट को बदल दिया
मप्र सरकार द्वारा 1973 में विश्वविद्यालय एकीकृत अधिनियम बनाया जो विधानसभा में पारित हुआ, जिसके बाद से सागर विवि में कुलपति पद की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल या यूं कहें कि सरकार के हाथ में आ गया। हालांकि 2009 में विश्वविद्यालय को केंद्रीय विवि घोषित कर दिया गया जिसके बाद से अब विश्वविद्यालय में कुलपति पद की नियुक्ति सीधे राष्ट्रपति के हाथ में आ गई है।

अमिताभ बच्चन से हारे थे पूव कुलपति के दामाद
सागर विश्वविद्यालय में कुलपति रहे व ख्यात राजनीतिज्ञ डीपी मिश्रा को कुलपति का चुनाव हराकर कुलपति बनने वाले प्रो. आरपी त्रिपाठी की बेटी देश के ख्यात नाम समाजवादी नेता हेमवंती नंदन बहुगुणा की पत्नी थीं। बता दें कि इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से 1984 के चुनाव में हिंदी सिनेमा के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन ने हेमवती नंदन बहुगुणा को चुनाव हराया था और तब यह सबसे ज्यादा चर्चित चुनाव रहा।

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