MP News: क्या भाजपा अब सिंधिया से ऊब चुकी है या फिर ज्योतिरादित्य खुद किसी बड़े फैसले की ओर अग्रसर

MP Scindia News: हाल ही में हुए मध्य प्रदेश के उपचुनावों के परिणाम और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बयान ने प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है।

इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े कई सवाल उठ रहे हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि क्या भारतीय जनता पार्टी अब सिंधिया से ऊब चुकी है या फिर सिंधिया खुद किसी बड़े फैसले की ओर अग्रसर हैं?

BJP is now bored with Jyotiraditya Scindia will he join Congress again conflict over by-elections

विजयपुर उपचुनाव की हार और सिंधिया का बयान

विजयपुर सीट, जो ग्वालियर-चंबल संभाग में आती है और जिसे सिंधिया का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है, वहां भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। खासतौर पर, कांग्रेस के मुकेश मल्होत्रा ने भाजपा के रामनिवास रावत को 7 हजार से अधिक मतों से हराया। इसके बाद, सिंधिया ने हार पर चिंतन की आवश्यकता जताते हुए यह कहा कि यदि उन्हें कहा जाता तो वे प्रचार करते। इस बयान के बाद भाजपा राज्य इकाई ने पलटवार करते हुए कहा कि सिंधिया को प्रचार के लिए कई बार आग्रह किया गया था, लेकिन उन्होंने अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए प्रचार करने से मना कर दिया था।

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मैं बयान के बयान में नहीं लगता- सिंधिया

इसके बाद संगठन के जवाब पर कल गुना में सिंधिया से पत्रकारों ने सवाल किया तो उन्होंने कहा कि मैं बयान के बयान में नहीं लगता। इसका मतलब साफ है कि भाजपा संगठन और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच पूरी तरह अब कुछ ठीक नहीं है।

भाजपा का दृष्टिकोण और भविष्य की संभावनाएं

इस घटनाक्रम से यह सवाल उठता है कि क्या भाजपा अब सिंधिया को एक बोझ समझने लगी है? उनकी बयानबाजी और उपचुनावों में सक्रियता से ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा की प्रदेश इकाई और सिंधिया के बीच कुछ मतभेद उत्पन्न हो रहे हैं। विशेषकर विजयपुर सीट की हार के बाद भाजपा ने सिंधिया पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालने की कोशिश की है, लेकिन सिंधिया का यह कहना कि उन्हें प्रचार करने के लिए नहीं कहा गया, ये बात पार्टी की नेतृत्व प्रणाली और उनके कार्यों के बीच की दूरी को उजागर करता है। हालांकि भाजपा राज्य इकाई ने इस बात को नकारा है।

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सिंधिया के विकल्प

यह भी सवाल उठता है कि क्या सिंधिया अब भाजपा से खुद को अलग करने का मन बना चुके हैं या फिर वे किसी और दल की ओर रुख करेंगे? मध्य प्रदेश की राजनीति में सिंधिया की एक मजबूत उपस्थिति है, लेकिन अगर भाजपा में उनका प्रभाव घटता है, तो वे पार्टी के भीतर और बाहर दोनों ही जगह विकल्प तलाश सकते हैं। इस सूरत में सिंधिया के लिए कांग्रेस के साथ ही अन्य राजनीतिक विकल्पों का दरवाजा भी खुला रह सकता है, खासकर अगर वे अपनी छवि और राजनीतिक प्रभाव को पुनः स्थापित करने का निर्णय लेते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार लखन गुरू की इस मामले पर टिप्पणी

वरिष्ठ पत्रकार लखन गुरू का कहना है कि सिंधिया अब "न घर के रहे, न घाट के" स्थिति में हैं, यानी न तो वे पूरी तरह से कांग्रेस के हैं और न ही भाजपा के भीतर उन्हें पूरी तरह से स्वीकार किया जा रहा है। अभी की परिस्थिति के अनुसार तो यही कहा जा सकता है।

मोदी-0.2 और मोदी-0.3 में सिंधिया की स्थिति

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल (मोदी-0.2) में सिंधिया को उड्डयन और इस्पात मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं, जिनमें उन्होंने अच्छा काम किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी जमकर तारीफ भी की। लेकिन इसके बाद मोदी-0.3 में उनके मंत्रालयों का स्वरूप और प्रभाव कम हुआ। उन्हें संचार और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय जैसे मंत्रालय दिए गए, जो भले ही अहम हैं, लेकिन उड्डयन और इस्पात मंत्रालयों की तुलना में कम प्रभावी माने जाते हैं। यह बदलाव कई विश्लेषकों द्वारा सिंधिया के राजनीतिक प्रभाव में गिरावट के रूप में देखा जा रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा में उनके लिए अब पहले जैसा महत्व नहीं बचा है।

सिंधिया की कम होती पूछपरख

मोदी-0.3 के दौरान सिंधिया की राजनीतिक पूछपरख में कमी आई है, यह बात चर्चा का विषय रही है। पार्टी के भीतर उन्हें उतना महत्व नहीं दिया जा रहा, जितना पहले था। इसके अलावा, सिंधिया की बॉडी लैंग्वेज और उनकी खनकदार आवाज़ में भी वह पहले जैसा आत्मविश्वास और प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा, जो पहले भाजपा में उनकी पहचान था। यह सब संकेत करता है कि सिंधिया की राजनीतिक स्थिति में बदलाव आ रहा है, और भाजपा के भीतर उनकी भूमिका अब उतनी प्रभावी नहीं रही जितनी पहले थी।

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राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात

ज्योतिरादित्य सिंधिया की राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात के चर्चे मध्य प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में जोर पकड़ते जा रहे हैं। यह मुलाकात संविधान दिवस पर दिल्ली में आयोजित केंद्र सरकार के जलसे के दौरान हुई थी, और इसकी चर्चा के बाद कई राजनीतिक अटकलें और विश्लेषण सामने आए हैं।

मुलाकात का औपचारिक पहलू

सिंधिया के नजदीकी सूत्रों ने इस मुलाकात को "शिष्टाचार भेंट" बताया है, जिससे यह स्पष्ट किया गया कि यह मुलाकात व्यक्तिगत और औपचारिक थी, न कि कोई राजनीतिक बयानबाजी या संवाद का हिस्सा। कांग्रेस की तरफ से भी इस मुलाकात को एक शिष्टाचार भेंट के रूप में पेश किया गया। खासकर कांग्रेस नेताओं ने यह बताया कि राहुल गांधी सिंधिया से पहले नहीं मिल पाए थे, क्योंकि सिंधिया की मां के निधन के बाद वे व्यस्त थे, और अब यह मुलाकात एक सामाजिक और शिष्टाचारिक रूप से हुई।

हालांकि यह मुलाकात शिष्टाचारिक बताई जा रही है, फिर भी इसके राजनीतिक एंगल से देखा जा रहा है। कांग्रेस के एक समय के प्रमुख नेता और अब भाजपा में शामिल हुए सिंधिया की इस मुलाकात को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टी के भीतर और बाहर चर्चा का विषय बन गया है। भाजपा के भीतर भी सिंधिया के खिलाफ पलटवार करने के बाद, यह मुलाकात और भी ज्यादा ध्यान आकर्षित कर रही है। सवाल यह उठ रहे हैं कि क्या सिंधिया ने भाजपा के अंदर अपने संभावित स्थान या भविष्य को लेकर कोई संकेत दिया है, या यह केवल एक औपचारिक मुलाकात थी?

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