BMC के डॉ. सुमित रावत अंतरराष्ट्रीय बिल एंड मेलिंडा गेट्स अवॉर्ड से सम्मानित
Bundelkhand Medical College सागर BMC में माइक्रोवायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुमित रावत को अंतरराष्ट्रीय बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन प्रोफेशलन डेवलपमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया हैं। मलेशिया की राजधानी क्वालालम्पुर में आयोजित गरिमामय समारोह में शनिवार को डॉ. रावत को बिल गेट्स फाउंडेशन द्वारा अवॉर्ड प्रदान किया गया। यह अवार्ड उनकी महत्वपूर्ण रिसर्च 'कोविड एसोसिएटेड हेपेटाइटिस इन चिल्ड्रन' के लिए प्रदान किया गया है। डॉ. रावत सहित इंडिया से चार लोगों को उनके बेहतर काम के लिए अवार्ड प्रदान किए गए हैं। इनमें तीन डॉक्टर शामिल है।

बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में पदस्थ एसोसिएट प्रोफेसर व वायरोलॉजी लैब के नोडल अधिकारी डॉ. सुमित रावत ने बीएमसी सहित सागर का नाम रोशन किया हैं। उन्होंने कुछ समय पहले 'कोविड एसोसिएटेड हेपेटाइटिस इन चिल्ड्रन' पर रिसर्च की थी। बता दें कि पहले उनकी इस रिसर्च को चिकित्सा जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने नकार दिया था, लेकिन कोविड की दूसरी लहर जब महामारी साबित हुई तो उनकी इस रिसर्च को इंडिया सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया और रिसर्च को मान्यता प्रदान की गई थी। इसके बाद उनका चयन बिल गेट्स के ख्यात फाउंडेशन बिल एंड मेलिंडा ने उनका चयन प्रोफेशनल डेव्हलपमेंट अवार्ड के लिए किया गया था। शनिवार को उन्हें क्वालालम्पुर में समारोह पूर्वक यह अवार्ड, प्रमाण-पत्र, मोमेंटो व 1 हजार डॉलर की राशि प्रदान कर सम्मानित किया गया। डॉ. रावत को ये अवार्ड मेडिकल साइंस के क्षेत्र में रिसर्च के लिए दिया जाएगा है। कोरोना की दूसरी लहर में बड़ी संख्या में हेपेटाइटिस का शिकार हो रहे बच्चों पर डॉक्टर ने रिसर्च की थी, जिसे पहले डब्ल्यूएचओ ने नकार दिया था, फिर 8 महीने बाद मान्यता दी। बता दें कि डॉ. रावत की रिसर्च नेचर और ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हो चुकी है।

जिस रिसर्च ने अवार्ड दिलाया, उसे डब्ल्यूएचओ ने नकार दिया था
माइक्रोवायोलॉजिस्ट डॉ. सुमित रावत को ये प्रतिष्ठित अवार्ड मेडिकल साइंस के क्षेत्र में रिसर्च के लिए दिया गया है, उसके साथ अजब कहानी जुड़ी है। जब यह रिसर्च की गई थी उस समय कोरोना की दूसरी लहर में बड़ी संख्या में बच्चे हेपेटाइटिस का शिकार हो रहे। बच्चों पर उन्होंने रिसर्च की थी, लेकिन जब रिसर्च पूरी कर सबमिट किया तो डब्ल्यूएचओ ने इसे नकार दिया था। बाद में करीब 8 महीने बाद उनकी रिसर्च को 100 फीसदी सटीक माना गया और मान्यता दी गई। यहां तक कि डॉ. रावत की रिसर्च नेचर और ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हो चुकी है।












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