आखिर गिरजाधार में ही क्यों डूबते हैं 'बिल्वपत्र', जानिए चमत्कारिक वजह
सागर, 15 जुलाई। बुंदेलखंड में "गिरजाधार" देश का एकमात्र ऐसा स्थान हैं जहां श्रद्धा से बेलपत्र चढ़ाने से वे सीधे पानी की तलहटी में समा जाते हैं, जबकि अन्य पेड़ -पौधों के पत्ते, फूल पानी में उतराते रहते हैं। इस स्थान पर विज्ञान के उलट नदी का सिद्धांत है । भगवान शिव को चढ़ने वाले बिल्वपत्र ही यहां क्यों तलहटी में समा जाते हैं, उसके बाद वे कहां जाते हैं, यह पहेली अब भी रहस्य बनी है।

गिरजाधार कुंड की तलहटी में समाते दिखते हैं बिल्वपत्र
बुंदेलखंड के संभागीय मुख्यालय सागर से करीब 45 किलोमीटर दूर राहतगढ़ से विदिशा मार्ग पर दोनों तरफ से पहाड़ों से घिरी बीना नदी पर बना है गिरजाधार घाट। नदी के दोनों छोर के बीच में बने इस गिरजाधार की गहराई कोई नहीं नाप पाया। काफी प्रयास के बाद लोग इतना ही अंदाजा लगा पाए कि करीब 100 मीटर से भी गहरी तलहटी है, लेकिन वास्तविक गहराई कोई नहीं नाप पाया।

यहां करोड़ों बेलपत्र चढ़े, वापस नहीं दिखे
राहतगढ ब्लॉक में जंगल और पहाडी के बीच बीना नदी पर बने गिरजाधार कुंड में सावन के महीने में लाखों बेलपत्र श्रद्धालुओं द्वारा नदी के जल में चढ़ाए गए। सभी के सभी पानी की तलहटी में समा जाते हैं, उसके बाद ये बेलपत्र कहां गायब हो जाते हैं, आज तक पता नहीं चल सका। साल में लगातार करोड़ों बिल्वपत्र यहां अर्पित होते हैं, लेकिन नदी में आगे-पीछे किसी ने नहीं देखे कि वे कभी इस कुंड से आगे जाकर नदी की धारा में बहते दिखे हों।

गिरजाधार की तलहटी में शिवमंदिर की मान्यता
स्थानीय लोग व जानकार बताते हैं कि गिरजाधार नदी की तलहटी में आदिकाल का शिवमंदिर है। उस समय बीना नदी का उद्भव नहीं था, बाद में नदी की धार ऊपर से बहने लगी और भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग व मंदिर ने जलसमाधि ले ली। जागृत शिवमंदिर होने के कारण आज भी बेलपत्र पानी में चढ़ाने से वे सीधे नदी की तलहटी में विराजमान शंकरजी तक पहुंचते हैं।

संत श्री दयालदास की तपोस्थली रहा है
गिरजाधार घाट पर भगवान भोलेनाथ व अन्य देवी-देवताओं के मंदिर बने हुए हैं। यहीं पर संत दयालदास महाराज की समाधि भी मौजूद है। दो दशक पहले तक यह स्थान संत दयालदास की तपोस्थली रहा है। मंदिर से जुडे लोग व उनके शिष्य बताते हैं कि संत दयालदास महाराज को महादेव की कृपा प्राप्त थी। उन्होंने योग शक्तियां प्राप्त कर ली थीं। वे पांच-पांच घंटे इसी गिरजाधार के कुंड में जलसमाधि लगाए रहते थे।

नदी में मगरमच्छ, आज तक नुकसान नहीं पहुंचाया
बीना नदी के गिरजाधार में मगरमच्छ को जोड़ा भी रहता है, लेकिन ये केवल नदी के दूसरे छोर पर ही दिखाई देते हैं। गिरजाधार वाले घाट पर ये कभी नहीं दिखाई देते हैं। स्थानीय लोग व मंदिर के सेवक बताते हैं कि इन मगरमच्छ ने इंसान तो क्या यहां किसी जानवर तक को नुकसान नहीं पहुंचाया है। ठंड के समय कई लोगों ने नदी के दूसरी तरफ चट्टानों पर इन्हें धूप सेंकते हुए साफ-साफ देखा है। हालांकि अब ये कम ही दिखाई देते हैं। सबसे हैरत की बात मगरमच्छ द्वारा शिकार किए जाने का इस इलाके में एक भी मामला नहीं है।












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