MP News: जबलपुर में बाबू की करतूत, 7 करोड़ की हेराफेरी, फर्जी दस्तावेज बनाए, सुसाइड नोट लिखकर फरार
MP News: मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक ऐसा घोटाला सामने आया है, जिसने सरकारी सिस्टम की पोल खोल दी है। स्थानीय निधि संपरीक्षा कार्यालय में पदस्थ बाबू संदीप शर्मा ने सैलरी सॉफ्टवेयर में हेरफेर कर 7 करोड़ से ज्यादा की रकम हड़प ली। इतना ही नहीं, उसने हाईकोर्ट का फर्जी आदेश बनाकर भी सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये निकाल लिए और किसी को भनक तक नहीं लगी।
इस सनसनीखेज मामले में ओमती थाना पुलिस ने संदीप सहित पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, लेकिन सभी आरोपी फरार हैं। पुलिस की तलाशी के बीच संदीप का एक कथित सुसाइड नोट भी सामने आया है, जिसमें उसने गबन की जिम्मेदारी लेते हुए आत्महत्या की बात लिखी है। यह घोटाला अब जबलपुर से लेकर भोपाल तक चर्चा का विषय बन गया है।

सॉफ्टवेयर में हेरफेर, 44 हजार की सैलरी को बनाया 4.44 लाख!
संदीप शर्मा, जो 2012 में अपने पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति पर संपरीक्षा विभाग में सहायक ग्रेड-3 के पद पर भर्ती हुआ था, सॉफ्टवेयर संचालन में एक्सपर्ट था। उसने अपनी इस स्किल का गलत इस्तेमाल कर सरकारी सिस्टम को ठगने का खेल शुरू किया। उसकी मूल सैलरी 44 हजार रुपये थी, लेकिन उसने सैलरी सॉफ्टवेयर में हेरफेर कर इसे बढ़ाकर 4 लाख 44 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया। जब उसे यह रकम बिना किसी सवाल के मिल गई, तो उसे समझ आ गया कि सिस्टम में कोई खामी है, जिसका फायदा वह आसानी से उठा सकता है।
संदीप ने न सिर्फ अपनी सैलरी बढ़ाई, बल्कि फर्जी कर्मचारियों के नाम पर वेतन निकालना शुरू कर दिया। उसने हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच के नाम से फर्जी ऑर्डर शीट तैयार की और महाधिवक्ता कार्यालय के पत्र में डिजिटल एडिटिंग कर फर्जी दस्तावेज बनाए। उसने कुछ काल्पनिक कर्मचारियों को रिटायर दिखाकर उनकी ग्रेच्युटी तक निकाल ली। इस तरह उसने 2021 से शुरू हुए इस फर्जीवाड़े में महज चार साल में 7 करोड़ से ज्यादा की रकम गबन कर ली।
हाईकोर्ट का फर्जी आदेश, अधिकारियों की नाक के नीचे ठगी
संदीप की चालाकी का आलम यह था कि उसने अपने विभाग प्रमुख से लेकर जिला कोषालय तक को ठग लिया। उसने हाईकोर्ट के फर्जी आदेश बनाकर ऐसे कर्मचारियों का रिटायरमेंट ऑर्डर जारी कर दिया, जो कभी नौकरी में थे ही नहीं। इन फर्जी दस्तावेजों के जरिए उसने करोड़ों रुपये अपने और अपने रिश्तेदारों के खातों में ट्रांसफर कर दिए। हैरानी की बात यह है कि इस दौरान किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी। संयुक्त संचालक मनोज बरहैया, जिनकी फाइनल टीप के बिना कोई बिल पास नहीं होता था, उन्होंने भी इन दस्तावेजों को बिना जाँच के मंजूरी दे दी। इस लापरवाही ने संदीप को और बेखौफ बना दिया।
13 मार्च को एफआईआर, लेकिन सभी आरोपी फरार
घोटाले का खुलासा तब हुआ, जब जिला कोषालय में एक बिल की कागजी और डिजिटल प्रतियों में अलग-अलग रकम दर्ज मिली। शुरुआती जाँच में 55 लाख रुपये की हेराफेरी का पता चला, लेकिन गहन जांच के बाद यह रकम बढ़कर 7 करोड़ से ज्यादा हो गई। जिला कोषालय अधिकारी विनायिक लकरा ने 13 मार्च 2025 को ओमती थाना में संदीप शर्मा सहित पांच लोगों-संयुक्त संचालक मनोज बरहैया, सीनियर ऑडिटर सीमा अमित तिवारी, सहायक संचालक प्रिया विश्नोई और अनूप कुमार-के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। इन पर आईपीसी की धारा 409, 419, 420, 467, 468, 471 और 120बी के तहत मामला दर्ज किया गया। लेकिन एफआईआर के बाद से ही सभी आरोपी फरार हैं। ओमती थाना प्रभारी राजपाल बघेल ने बताया, "संदीप शर्मा सहित सभी आरोपी फरार हैं। उनकी तलाश के लिए लगातार छापेमारी की जा रही है।"
ग्वारीघाट में छिपा था संदीप, पुलिस पहुंची तो फरार
पुलिस को सूचना मिली कि संदीप शर्मा ग्वारीघाट स्थित सुखसागर वैली में अपनी बहन के घर पर छिपा हुआ है। उसका मोबाइल 25 फरवरी से बंद था, और वह कुछ नए नंबरों का इस्तेमाल कर रहा था। कलेक्टर दीपक कुमार सक्सेना के निर्देश पर पुलिस ने मंगलवार, 25 मार्च को सुखसागर वैली में दबिश दी, लेकिन पुलिस के पहुंचने से पहले ही संदीप फरार हो गया। उसकी बहन से पूछताछ में पता चला कि वह संभवतः उत्तर प्रदेश भाग गया है। सूत्रों के मुताबिक, ग्वारीघाट से निकलने के बाद वह जबलपुर रेलवे स्टेशन पहुँचा और वहाँ से फरार हो गया।
हैरानी की बात यह है कि जब पुलिस उसे प्रदेश के बाहर तलाश रही थी, तब वह कई दिनों तक जबलपुर में ही अपनी बहन के घर छिपा रहा। अब पुलिस की एक टीम उत्तर प्रदेश रवाना होने की तैयारी कर रही है। कलेक्टर दीपक सक्सेना ने कहा, "यह घोटाला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हो सकता। सभी आरोपियों की संपत्तियों की जाँच की जाएगी और राशि की रिकवरी भी होगी।"
संदीप का कथित सुसाइड नोट: "मैंने सभी के साथ विश्वासघात किया"
घोटाले के खुलासे के बाद 25 फरवरी से गायब संदीप शर्मा का एक कथित सुसाइड नोट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस पत्र में उसने गबन की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए आत्महत्या की बात लिखी है। पत्र में संदीप ने लिखा, "मैं संदीप शर्मा, पूरे होशो-हवास में यह पत्र लिख रहा हूँ। पासवर्ड और आईडी का इस्तेमाल मैंने किया है। जितने भी फर्जी बिल लगे हैं, मैंने उनकी आईडी का इस्तेमाल किया है। इसमें संबंधित किसी भी प्रकार का कोई दोषी नहीं है। मैंने सभी के साथ विश्वासघात किया है। मैं कार्यालय नहीं आ सकता, इसलिए यह सब लिख रहा हूँ, और शायद अब कभी भी नहीं आऊंगा।"
पत्र में उसने आगे लिखा, "मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है, इसलिए मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ। यह फैसला मेरा है। इसमें किसी का दबाव नहीं है। सीमा मैम, प्रिया मैम, आदरणीय जेडी सर, इन सबकी आईडी और पासवर्ड मैंने गलत तरीके से उपयोग किए हैं। हो सके तो मुझे माफ कर देना। मैं, संदीप शर्मा, आत्महत्या कर रहा हूँ। परिवार वालों से नजर नहीं मिला सकता, उनका मैं दोषी हूँ।" इस पत्र की सत्यता की जाँच अभी पुलिस कर रही है, लेकिन इसने मामले को और सनसनीखेज बना दिया है।
अधिकारियों पर भी गाज: निलंबन और ट्रांसफर
घोटाले की गूंज जबलपुर से भोपाल तक पहुँच गई। आनन-फानन में संयुक्त संचालक मनोज बरहैया, सीमा अमित तिवारी, प्रिया विश्नोई और संदीप शर्मा को निलंबित कर दिया गया। मनोज बरहैया को जबलपुर से हटाकर भोपाल अटैच कर दिया गया, और उनकी जगह रीवा से अमित विजय पाठक को नया संयुक्त संचालक नियुक्त किया गया। बीजेपी विधायक अजय विश्नोई ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर इस मामले की उच्च स्तरीय जाँच की माँग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस घोटाले में भोपाल में बैठे कुछ बड़े अधिकारियों की भी भूमिका हो सकती है।
सिस्टम की खामियों का सवाल
यह घोटाला सरकारी सिस्टम की खामियों को उजागर करता है। सवाल यह है कि चार साल तक इतने बड़े पैमाने पर हेरफेर कैसे चलता रहा, और किसी को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी? सॉफ्टवेयर में हेरफेर, फर्जी दस्तावेज, और हाईकोर्ट के फर्जी आदेश-इतने बड़े स्तर पर धोखाधड़ी के बावजूद सिस्टम की निगरानी क्यों नाकाम रही? क्या यह सिर्फ संदीप की चालाकी थी, या फिर इसमें बड़े अधिकारियों की मिलीभगत भी थी? यह सवाल अब हर किसी के मन में है।
एक अनसुलझा रहस्य: संदीप जिंदा है या मर चुका?
संदीप शर्मा का कथित सुसाइड नोट सामने आने के बाद यह सवाल और बड़ा हो गया है कि क्या वह जिंदा है, या उसने सच में आत्महत्या कर ली? पुलिस उसकी तलाश में दिन-रात एक कर रही है, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला। कुछ लोग मानते हैं कि यह सुसाइड नोट पुलिस को गुमराह करने की एक चाल हो सकती है, ताकि वह आसानी से फरार हो सके। वहीं, कुछ का कहना है कि शायद उसने सच में अपनी जिंदगी खत्म कर ली हो।
यह घोटाला न सिर्फ एक वित्तीय अपराध की कहानी है, बल्कि यह सिस्टम की नाकामी और लापरवाही की भी मिसाल है। अब देखना यह है कि क्या पुलिस संदीप शर्मा को पकड़ पाती है, और क्या इस घोटाले के पीछे बड़े चेहरों का पर्दाफाश हो पाता है। यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है-आने वाले दिनों में इसके और राज खुल सकते हैं। लेकिन एक बात तय है, इस घोटाले ने सरकारी सिस्टम पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब मिलना अभी बाकी है!












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