पहली बार नहीं हुई यूपी में पुलिस की हत्या, गुंडाराज बन रही है यहां की संस्कृति
लखनऊ। मथुरा में पुलिस और अवैध कब्जाधारियों के बीच गुरुवार को हुई भिड़ंत में जिसमें एसपी मुकुंद द्विवेदी और एसएचओ संतोष यादव की मृत्यु हो गयी ने यूपी में अखिलेश राज की हकीकत को लोगों के सामने खोलकर रख दिया है।

जिस तरह से पुलिसकर्मियों को हत्या की गयी उसने सवाल खड़े कर दिये हैं कि जब पुलिस ही प्रदेश में सुरक्षित नहीं है तो लोग कैसे यहां सुरक्षित होंगे। इस घटना के बाद लोग इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि यूपी पुलिस लोगों को किस तरह की सुरक्षा मुहैया करा सकती है।
इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी इस मामले की साधारण सी जांच के आदेश दे दिये गये हैं। वहीं भाजपा ने सपा सरकार पर बड़ा हमला बोला है। यही नहीं अन्य पार्टियों ने सपा पर निशाना साधा है। लेकिन यह सब काफी लंबे समय से यूपी की राजनीति में चला आ रहा है इसमें कुछ भी नया नहीं है।
यही है रामवृक्ष यादव जिसके इशारे पर मथुरा में मचा मौत का तांडव
इस घटना के बाद जो सबसे बड़ी और अहम बात निकलकर सामने आयी है वह है कि यूपी एक बार फिर से पूरा का पूरा सिस्टम पूरी तरह से फेल हो गया। यह भी पहली बार नहीं हुआ है बल्कि इससे पहले भी यह तीन बार हो चुका है।
वर्ष 2013 में डीएसपी जियाउल हक को तथाकथित भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया। इस हादसे में सब इंस्पेक्टर भी बुरी तरह से घायल हो गये थे। कुंडा के डीएसपी हक की हत्या उस वक्त हुई जब वह ग्राम प्रधान की हत्या के बाद चल रहे विरोध को रोकने के लिए गये थे। एक के बाद एक इस कुंडा के गांव में तीन हत्या हुई थी। जिसके बाद पुलिस हालत को काबू करने के लिए मौके पर गयी थी।
यह हत्या राजा भैया के क्षेत्र में हुई थी, जिन्हें यूपी की राजनीति में कद्दावर बाहुबली नेता माना जाता है। वह मौजूदा समय में सपा विधायक और अहम मंत्रालय भी संभाल रहे हैं। हक के परिवार वालों ने इस हत्या के पीछे राजा भैया का हाथ होने का आरोप लगाया था।
इन दो बड़े पुलिस अधिकारियों की हत्या से पहले रेत माफिया के खिलाफ कार्यवाही करने की वजह से आईएस अधिकारी को भी काफी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था। गौतम बुद्ध नगर की एसडीएम दुर्गाशक्ति नागपाल को रेत माफियाओ के खिलाफ कार्यवाही के चलते काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी
ऐसे में अगर युपी में गुंडाराज की प्रथा को खत्म नहीं किया जाता है तो यूपी सरकार की मुश्किल काफी बढ़ सकती है। अगर इस बार आरोपियों को कटघरे में नहीं खड़ा किया गया तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इस तरह का हादसा एक बार फिर से नहीं होगा।












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