यूपी में चीनी मिलों से फैलेगी रौशनी, बिजली उत्पादन का बनेंगी अहम केंद्र
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में चीनी के उत्पादन के लिए सबसे बड़े प्रदेश के रूप में जाना जाता है। चीनी मिलों में चीनी के इतर बिजली के उत्पादन का भी काम होता है ये तथ्य कम ही लोगों को पता होगा।

दरअसल चीनी मिलों में गन्ने की पिराई से गन्ने का एक अवशेष, खोई, चीनी मिल में भाप बनाने के वास्ते एक प्रमुख ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बिजली पैदा करने के लिए भट्टी में उत्पन्न उच्च दबाव की भाप को टर्बो जनरेटर के ब्लेड घुमाने में उपयोग किया जा सकता है।
सह उत्पादन के जरिए होगा बिजली का उत्पादन
बिजली पैदा करने की इस प्रक्रिया को सह-उत्पादन कहा जाता है जिसका तात्पर्य ऊर्जा के दो रूपों , बिजली और ऊष्म का उत्पादन है। इस बिजली का इस्तेमाल चीनी मिल की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है तथा शेष बिजली ग्रिड को दी जा सकती है।
सह-उत्पादन या बिजली के मिश्रण के साथ उत्पादन केवल चीनी मिलों तक ही सीमित नहीं है। कागज़ तथा गूदा, कपड़ा, उर्वरक, पेट्रोलियम,पेट्रोकैमिकल तथा खाद्य संस्करण जैसे कई अन्य उद्योगों में कार्य के लिए इलैक्ट्रिकल के साथ-साथ थर्मल ऊर्जा की आवश्यकता होती है तथा ऐसे में सह-उत्पादन को एक प्रक्रिया के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
सह-उत्पादन' या ‘ संयुक्त ऊष्म और बिजली' से, ईंधन की कुल खपत में उल्लेखनीय कमी आती है। सह-उत्पादन में इस्तेमाल ऊर्जा की दक्षता 85 प्रतिशत तक होती है तथा कई मामलों में यह इससे भी अधिक होती है।
मौजूदा परिदृश्य में, जब जीवाश्म ईंधन की कीमत में काफी वृद्धि हो रही है तथा कोयले की उपलब्धता में कमी है ऐसे में सह-उत्पादन एक आशाजनक विकास के रूप में दिखता है।
ग्रीन हाउस गैंसों में होगी बढ़ोत्तरी
ग्रीन हाउस गैसों में कटौती करने संबंधी जागरूकता बढ़ाने के साथ साथ सह-उत्पादन जैसी प्रक्रियाओं की ज़रूरत बढ़ाने की भी आवश्यकता है। यह जीवाश्म ईंधन से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी मदद करती है।
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय विभिन्न प्रोत्साहन आधारित योजनाओं के ज़रिए सह-उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है। भारत में जैव ईंधन सह-उत्पादन कार्यक्रम वर्तमान में दो घटकों में विभाजित है (1) खोई आधारित (2) खोई रहित आधारित। खोई सह-उत्पादन का इस्तेमाल आवश्यक रूप से चीनी मिलों में किया जाता है तथा खोई रहित सह-उत्पादन का इस्तेमाल जैव ईंधन उद्योग में किया जा सकता है।
खोई आधारित सह-उत्पादन
खोई आधिारित सह-उत्पादन का विशेष रूप से इस्तेमाल चीनी मिलों में किया जाता है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक है। 2010-11 में भारत में गन्ने का लगभग 340 मिलियन टन उत्पादन हुआ था।
भारत की 527 कार्यरत चीनी मिल हर साल 240 मिलियन टन गन्ने की पिराई करती हैं तथा 80 मिलियन टन की आद्र खोई (50 प्रतिशत आद्र) का उत्पादन होता है जिसमें से लगभग 70 मिलियन टन का इस्तेमाल वे बिजली और भाप की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं।
इस प्रकार से कम लागत और गैर-पारंपरिक बिजली की आपूर्ति के लिए चीनी मिलों में सह-उत्पादन के ज़रिए बिजली का उत्पादन एक महत्वपूर्ण उपाय है।
अधिक बिजली पैदा करने तथा उसे ग्रिड को देने के लिए भारत में खोई सह-उत्पादन को बढ़ावा देने का प्रयास 1988-89 में तमिलनाडु में सहकारी चीनी मिलों में दो प्रायोगिक परियोजनाओं के साथ शुरू हुआ था।
हालांकि चीनी उद्योग में सह-उत्पादन के जरिए अतिरिक्त बिजली उत्पादन की संभावनाएं काफी समय पहले से जानकारी में थी लेकिन बेहतर तरीके से इसका इस्तेमाल 1994 में सरकार द्वारा खोई आधारित सह-उत्पादन के कार्यक्रम की घोषणा के बाद ही हो सका था।
यूपी ही नहीं कई प्रदेशों में हो रहा चीनी मिलों में बिजली उत्पादन
आंध्र प्रदेश, बिहार, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड राज्यों में अभी तक 170 चीनी मिलों में लगभग 1854 मेगावॉट अतिरिक्त बिजली उत्पादन की शुरूआत की गई है।
निजी क्षेत्र की लगभग 20 चीनी मिलों में 200 मेगावॉट से अधिक की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। सर्वोत्कृष्ट खोई सह-उत्पादन से न केवल चीनी मिलों को लाभ होता है बल्कि गन्ना किसानों को भी फायदा पहुंचता है क्योंकि इससे उनके गन्ने की कीमत बढ़ जाती है तथा वह इसके लिए अधिक धन प्राप्त कर सकते हैं।
उद्योगों में ऊर्जा सह-उत्पादन (खोई रहित) कार्यक्रम
औद्योगिक क्षेत्र आज लगभग देश में पैदा हुई कुल 35 प्रतिशत बिजली का इस्तेमाल करते हैं। इसके साथ-साथ इस क्षेत्र के लिए, प्रस्तावित उच्च विकास दर को कायम रखने के लिए उच्च गुणवत्ता वाली स्थायी बिजली की ज़रूरत है।
भारत में अधिकतम उद्योगों को इलैक्ट्रिकल तथा थर्मल ऊर्जा की ज़रूरत है। वे बिजली या तो राज्य विद्युत बोर्ड से खरीदते हैं या मुख्य रूप से डीज़ल जनरेटर के जरिए खुद बिजली का उत्पादन करते हैं।
कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल करके अपनी ऊर्जा जरूरतों (कैप्टिव) को पूरा करते हैं, क्योंकि जीवाश्म ईंधन की कमी है तथा इनका पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है इसलिए इलैक्ट्रिकल तथा थर्मल ऊर्जा की अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जैव ईंधन संसाधनों सहित गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल करना उचित होगा।
पूर्व में कम लागत पर बिजली और ईंधन मिलने के कारण, औद्योगिक सह-उत्पादन, पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया था। हालांकि बढ़ते शुल्क तथा बिजली की आपूर्ति में कमी होने से औद्योगिक क्षेत्र के लिए बिजली उत्पादन तथा थर्मल ऊर्जा के लिए सह-उत्पादन प्रक्रिया का इस्तेमाल करना बेहतर रहेगा।
चीनी मिलों से ही नहीं अन्य उद्योगों में भी होता है बिजली उत्पादन
विशेषकर कॉस्टिक सोडा प्लांट, कपड़ा मिल, उर्वरक संयंत्र, कागज़ और गूदा उद्योग, चावल मिल आदि उद्योगों में काफी संभावनाएं हैं। इसके अतिरिक्त कोयला, तेल, लिगनाईट तथा गैस, प्रयोग नहीं किए गए।
कम प्रयोग किए गए अवशेषों जैसे पारंपरिक ईंधन पर आधारित सह-उत्पादन परियोजनाओं का इस्तेमाल भी उद्योगों द्वारा अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है।
बिजली (कैप्टिव) तथा थर्मल ऊर्जा की ज़रूरत को पूरा करने के लिए जैव सह-उत्पादन परियोजनाओं (खोई सह-उत्पादकता को छोड़कर) के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इसमें कम से कम 50 प्रतिशत बिजली उद्योग के लिए तथा तथा अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में निर्यात करने का प्रावधान है। इससे गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल में बढ़ोत्तरी हुई है तथा कोयला, तेल, तथा प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को संरक्षित किया जा रहा है।
ऐसी परियोजनाओं में अधिकतम 25 प्रतिशत पारंपरिक ईंधन के इस्तेमाल को मंज़ूरी दे दी गई है। उन्नति संबंधी योजनाओं के तहत राज्य नोडल एजेंसियों, गैर सरकारी संस्थानों तथा अन्य संबंधित संस्थानों को संगोष्ठियां, कार्यशाला, प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रौद्योगिकी वैधता, रणनीति अध्ययन, उद्योग-वार क्षेत्रीय अध्ययन तथा कार्य-निष्पादन की निगरानी और मूल्यांकन आदि हेतु अनुदान भी उपलब्ध कराया जाता है।
भारत में सह-उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नए प्रयास
सहकारी चीनी मिलों में बीओओटी (निर्माण, स्व, प्रचालन, स्थानांतरण) प्रारूप सह-उत्पादन परियोजनाएं: विशेष उद्देश्य कार्य या स्वतंत्र ऊर्जा निर्माता द्वारा सहकारी क्षेत्र में स्थापित चीनी मिलों में बीओओटी प्रारूप के जरिए खोई सह-उत्पादन परियोजनाओं के लिए केंद्रीय वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है।
इस मामले में, आधुनिकीकरण के साथ सह-उत्पादन ऊर्जा में निवेश बीओओटी निर्माताओं द्वारा किया जाता है। इस प्रारूप का फायदा यह है कि इसमें सहकारी मिल द्वारा इक्विटी और ऋण की ज़रूरत नहीं होती है तथा उसे चुकाने की जिम्मेदारी भी शून्य के बराबर होती है और जोखिम भी कम होता है।
बीओओटी अवधि के बाद सह-उत्पादन संयंत्र तथा परिसंपत्ति सहकारी चीनी मिलों को देनी होती है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने महाराष्ट्र और तमिलनाडु में बीओओटी प्रारूप परियोजनाओं का समर्थन किया है।
सरकार इन स्रोतों पर कर रही है तेजी से काम
तमिलनाडु में 180 मेगावॉट की कुल क्षमता वाली 12 सहकारी सार्वजनिक चीनी मिलों में बीओओटी परियोजनाएं तथा महाराष्ट्र में 80 मेगावॉट की कुल क्षमता वाली दो सहकारी चीनी मिलों में बीओओटी सह-उत्पादन परियोजनाओं का कार्यान्वयन होना है।
मंत्रालय अगले तीन वर्षों के दौरान कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात तथा उत्तर प्रदेश में सहकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की चीनी मिलों में इस प्रायस को बढ़ाने की योजना बना रहा है।
सहकारी चीनी मिलों में भट्टी में बदलाव: हाल ही में बनाई गई अनेक सहकारी चीनी मिलों ने मौजूदा भट्टी तथा टर्बाइन में बदलाव के जरिए न्यूनतम निवेश के साथ सह-उत्पादन ऊर्जा परियोजनाएं प्रारंभ करने के प्रयास किए हैं।
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने ऐसी चीनी मिलों में सह-उत्पादन परियोजना में भट्टी के उन्नयन के लिए केंद्र द्वारा वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए योजना में संशोधन किए हैं।
सह-उत्पादन पर आधारित परियोजनाओं को स्थापित करने के लिए नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा प्रोत्साहन आधारित योजनाओं तथा उद्योगों को तकनीकी सहायता देने से 12वी पंचवर्षीय अवधि में गैर पारंपरिक ऊर्जा कार्यक्रम को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
नोट- इस लेख में इनपुट डॉ. जे.आर.मेशराम और गार्गी मलिक द्वारा पीआईबी के लिये लिखे गये लेख से लिये गये हैं।
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