यूपी में फेल होगा राहुल का सियासी प्लान!

बात अगर देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस की करे तो लोकसभा चुनाव सिर पर होने के बावजूद वह जमीनी स्तर पर अपना संगठन ही नहीं खड़ा कर पा रही है। खास कर उत्तर प्रदेस में जहां सबसे ज्यादा लोकसभा की सीटें है पार्टी की हालत चरमराई हुई है। यहां पर अभी भी आधे से अधिक लोकसभा क्षेत्रों में बूथ कमेटियां तक गठित नहीं हो सकी है।
कई जगह कमेटियां गठित भी हुई हैं तो उनमें एक या दो कार्यकर्ता ही हैं। पार्टी की इस सुस्ती पर खुद यूपी प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री भी इस पर चिंता जता चुके हैं। दरअसल पार्टी यूपी में अब तक स्थिर ही नहीं हो पाई है। 2011 के बाद तीन पार्टी अध्यक्ष बदले जा चुके है। जोनल सिस्टम तक काम शुरु नहीं हो पाया है। जहां पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पार्टी कोे दिग्गज नेताओं को जोन की जिम्मेदारी दी थी वहीं इस बार विधायकों और पूर्व विधायकों को ही जोन की जिम्मेदारी दी गई है।
इतना ही नहीं कांग्रेस के यूपी प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री को प्रदेश कांग्रेस को चुस्त-दुरुस्त करने का जिम्मा मिला है। लेकिन वे भी केवल औपचारिकता निभाने तक सीमित हैं। मामला अंतकर्लंह का भी है। यूपी में नेताओं और विधायकों के बच एकता की कमी कांग्रेस को आगे बढ़ने से रोकती रही है। ये सबसे बड़ा कारण है कि कांग्रेस यू पी में अपनी साख धीरे-धीरे खोती जा रही है।












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