'पापों से मुक्ति' दिलाने वाली गंगा क्यों चाहती है मुक्ति
निश्चित तौर पर इस सवाल के कई सारे जवाब आपके जहन में भी जीवित हो उठे होंगे। प्रदूषित गंगा, गंगा की सफाई के लिए नाकाफी अभियान आदि आदि। बहरहाल आईये हम बात करते हैं कानपुर की। जो गंगा की पवित्रता के साथ-साथ गंगा के प्रदूषण के लिए भी जाना जाता है। हालांकि कानपुर में गंगा को प्रदूषित करने का सबसे बड़ा कारण गंगा के किनारे बसा जाजमऊ क्षेत्र है। जो कि चमड़ा उद्योग के लिए सर्वविदित है।

अवैध रूप से फलफूल रहा है चमड़ा उद्योग'
जानकारी के मुताबिक कानपुर में बनने वाला ज्यादातर चमड़ा बाहरी देशों में निर्यात किया जाता है। जिसमें यूरोप और अमरीका प्रमुख हैं। जहां पर इसका तरह-तरह से इस्तेमाल कर नई नई चीजें निर्मित की जाती हैं।
हालांकि गर चमड़े की बदबू की बात की जाए तो चाह आप कानपुर से लखनऊ की ओर आ रहे हों या फिर जा रहे हों कानपुर की ओर जा रहे हों जाजमऊ क्षेत्र में दुर्गंध की वजह से सांस लेना दूभर हो जाता है। लेकिन साहब धंधा है। और धंधे में कीमत भी। पर, इस कीमती उम्मीद के साथ ज्यादातर चमड़े के कारखाने अवैध रूप से भी संचालित किए जा रहे हैं। जो कि सबसे ज्यादा आपकी, हमारी गंगा को प्रभावित कर रहे हैं।
गंगा में क्रोमियम और क्रोमियम से कैंसर
इस मामले में हमने गंगा से सटे क्षेत्र में रह रहे लोगों से बातचीत की। लोगों ने बताया कि कुछ लोग गंगा में आज भी मौका देखते ही कूड़ा फेंक देते हैं। लेकिन ये तो महज एक कारण है गंगा को प्रभावित करने का। जबकि कुछ अन्य कारण इतने विशालकाय हैं, साथ ही खतरनाक हैं कि आप वाकई इन्हें जानकर हैरान रह जाएंगे।
चमड़े की मिल में काम करने वाले लोगों के मुताबिक चमड़ा उद्योग में चमड़े को मुलायम बनाने के लिए काफी ज़हरीले रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। इनका इस्तेमाल करते वक्त काफी सतर्कता बरती जाती है। जानकारी की मानें तो इन रसायनों में क्रोमियम भी होता है, जिससे कैंसर होने का ख़तरा होता है।
भ्रष्ट अधिकारियों के घालमेल के बगैर तो संभव नहीं
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के साथ दिल्ली में जल संसाधन मंत्रालय के तहत क्लीन गंगा मिशन के प्रभारी अधिकारी शशि शेखर की बातचीत के मुताबिक कानपुर में बिना लाइसेंस के करीब 200 चमड़े के कारखाने चल रहे हैं। शशि शेखर का मानना है कि भ्रष्ट अधिकारियों के सहयोग के बिना यह संभव नहीं है।
चोरी छिपे बहा दिया जाता है गंगा में ये 'जहर'!
आपको बता दें कि आज भी तमाम योजनाओं के बाद भी गंगा का प्रदूषण हजारों करोड़ के गंगा हेतु अभियान को गंगा में डुबोकर ही धता साबित कर रहा है। ज्यादातर कंपनियों में चमड़े को साफ करने वाला रसायन क्रोमियम रिकवरी प्लांट एवं गंदगी रोधक प्लांट की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में वे चोरी छिपे तरीके से इस खतरनाक रसायन को गंगा में बहा देते हैं। जो कि पापों से मुक्ति चाहने वालों के लिए वाकई भयावह है। साथ ही खतरनाक है गंगा जैसी पाक, पावन नदी के अस्तित्व के लिहाज से भी।
आवश्यकता है इन तमाम अव्यवस्थाओं पर ढंग से नकेल कसी जा सके। साथ ही हमें भी जागरूक होना होगा कि जिस पवित्र नदी के इतिहास में इस बात का जिक्र है कि राजा भगीरथ के पूर्वजों की मुक्ति के लिए जिस नदी का उद्गगम हुआ है, भला उसे हम कैसे प्रदूषित कर सकते हैं। कैसे खोने दे सकते हैं। लेकिन जितनी सच ये बातें हैं उतना ही सच ये भी है कि अपने मरते मिटते अस्तित्व को देखकर वाकई गंगा शायद दुनिया से मुक्ति की अरदास लगाने लगी हों।












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