Jharkhand Chunav: चंपाई सोरेन के आने के बाद भी कोल्हान क्यों है BJP के लिए चुनौती?
Jharkhand Chunav 2024: झारखंड के चुनावी जानकारों की मानें तो रांची में सत्ता सिंहासन का रास्ता इसबार भी कोल्हान क्षेत्र से ही होकर गुजरेगा। 2019 में बीजेपी को इस इलाके ने पूरी तरह से मायूस कर दिया था। इसलिए अबकी बार वह 'कोल्हान टाइगर' यानी पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन को जेएमएम से लेकर आई है। लेकिन, फिर भी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का यह गढ़ भाजपा की चुनौतियां कम नहीं होने दे रहा।
2019 में कोल्हान इलाके ने बीजेपी को पूरी तरह से मायूस किया था। पार्टी यहां की सभी 14 सीटों पर हारी थी। इस बार भाजपा यहां सत्ताधारी जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन से सीटें झटकने के लिए अपना सारा जोर लगा रही है। लेकिन, बीजेपी इसमें किस हद तक सफल होकेगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।

कोल्हान की 14 में से 9 ST और 1 SC सीट
कोल्हान बेल्ट एक आदिवासी-बहुल इलाका है। यहां 14 में से 10 विधानसभा सीटें रिजर्व हैं, जिनमें से 9 अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए और एक सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है।
2019 में सभी सुरक्षित सीटें जेएमएम गठबंधन को मिलीं
इस इलाके में सत्ताधारी जेएमएम गठबंधन के दबदबे का अंदाजा इसी से लगता है कि 2019 में इन रिजर्व सीटों में जेएमएम ने 9 एसटी और 1 एससी सीटों पर जीत दर्ज की थी। जबकि, उसकी सहयोगी कांग्रेस पार्टी ने बाकी बची एक एसटी सीट अपने खाते में किया था। मतलब, इस इलाके के आदिवासी वोटर जेएमएम गठबंधन के प्रभाव में थे।
बीजेपी ने चंपाई और उनके बेटे को भी उतारा
बीजेपी ने इंडिया ब्लॉक के इस दबदबे को खत्म करने के लिए काफी सोच-समझकर अबकी बार चुनावी बिसात बछाई है। सिर्फ जेएमएम के दिग्गज रहे 'कोल्हान टाइगर' या चंपाई सोरेन को ही उनकी परंपरागत सरायकेला सीट से नहीं उतारा है, उनके बेटे बाबूलाल सोरेन को भी घाटशिला से टिकट दिया है।
भाजपा ने अपने दिग्गज नेताओं के परिजनों भी दिया टिकट
सिर्फ यही दोनों पिता-पुत्र नहीं। भाजपा ने अपने कई दिग्गजों के परिजनों को भी यहां से आजमाया है। जैसे पूर्व सीएम और पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडी की पत्नी मीरा मुंडा पोटका से चुनाव लड़ रही हैं तो झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और ओडिशा के राज्यपाल रघुबर दास की बहू पूर्णिमा दास साहु जमशेदपुर पूर्वी से मैदान में हैं।
कोल्हान के आदिवासी वोटरों में अभी भी जेएमएम का प्रभाव-रिपोर्ट
जेएमएम ने इलाके के अपने 11 विधायकों में से 9 को टिकट दे दिया है। चंपाई अब भाजपा से हैं। उनकी जगह हेमंत सोरेन ने सरायकेला से गणेश महली को उतारा है। ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस इलाके में भाजपा काफी कोशिशें कर रही है, लेकिन आदिवासी वोटरों में अभी भी जेएमएम का प्रभाव कायम है।
मसलन, पोटका सीट के कुडाडा गांव के रहने वाले सूरज भुमिजी नाम के एक युवक जेएमएम उम्मीदवार संजीव सरदार के बारे में बातें करते हैं और मीरा मुंडा को बाहरी कह रहे हैं। उन्होंने कहा, 'सरदार यहां हमारे साथ हैं, जबकि मीरा मुंडी बाहरी हैं और कोई नहीं जानता कि चुनाव जीतने के बाद वह यहां आएंगी।'
इसी तरह से चाईबासा में 40 साल के एक क्रेन ऑपरेटर और जेएमएम के कट्टर समर्थक बिष्णु पुर्ति कहते हैं, 'जेएमएम ने आदिवासियों के लिए अच्छा काम किया है और मेरा वोट जेएमएम प्रत्याशी दीपक बिरुआ को जाएगा।' बीजेपी ने यहां से चाईबासा नगरपालिका परिषद के पूर्व अध्यक्ष गीता बालमुचू को उतारा है।
धीरे-धीरे आदिवासी वोटरों के बीच पकड़ बना रही है बीजेपी-रिपोर्ट
फिर भी चंपाई के चुनाव क्षेत्र सरायकेला से लेकर घाटशिला, खरसावां और पोटका जैसे कुछ विधानसभा क्षेत्रों में आदिवासियों के बीच भी बीजेपी की पकड़ बढ़ी है। आदिवासी वोट के लिए ही बीजेपी ने सोमवार को चाईबासा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली भी करवाई है। यहां प्रधानमंत्री ने आदिवासियों को छोटे कारोबारों के लिए वित्तीय सहायता दिए जाने की भी बात की है।
आदिवासी सीटों के अलामा अनारक्षित सीटों से भी बीजेपी की पूरी उम्मीद
पिछली बार के परिणामों से सीख लेते हुए पार्टी आदिवासी वोटरों और उनके लिए सुरक्षित सीटों के अलावा बाकी चार सामान्य सीटों पर भी पूरा फोकस कर रही है। पिछली बार यहां भी उसे धोखा मिला था।
ये सीटें हैं- जमशेदपुर पुर्वी, जमशेदपुर पश्चिमी, बहरागोड़ा और ईचागढ़। दरअसल, गैर-आदिवासी वोटरों के बीच भाजपा का यहां एक खास जनाधार है। जैसे कि खरसावां सीट के डुगनी बाजार में छोटी सी चाय दुकान चलाने वाले एक युवक रामल केवट कहते हैं, 'वह भाजपा को समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि वह बदलाव चाहते हैं।'












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