क्या वोटबैंक के लालच में आदिवासी हितों से खिलवाड़ कर रही है सोरेन सरकार? हाई कोर्ट भी कह रहा दुर्भाग्यपूर्ण
Jharkhand Bangladeshi infiltration: झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा सुर्खियों में है। राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या झारखंड में तेजी से बढ़ रही है, जो स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। ये घुसपैठिए न केवल आदिवासी समुदाय की भूमि पर कब्जा कर रहे हैं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संसाधनों पर भी असर डाल रहे हैं।
झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठियों के बढ़ते मामलों को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने भी चिंता जताई है। झारखंड हाई कोर्ट ने संथाल परगना क्षेत्र में बांग्लादेशी घुसपैठियों की अनुपस्थिति के बारे में उपायुक्त द्वारा दी गई गलत जानकारी पर अपनी नाराजगी व्यक्त की है। हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य में उपायुक्त की ओर से संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठिए नहीं होने की गलत जानकारी देना दुर्भाग्यपूर्ण है।

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हाई कोर्ट हेमंत सोरेन की सरकार पर इस मुद्दे को लेकर पहले भी सवाल उठा चुकी है। ऐसे में ये सवाल उठ रहा है कि क्या वोटबैंक के लालच में आदिवासी हितों के साथ हेमंत सोरेन की सरकार खिलवाड़ कर रही है।
बांग्लादेशी घुसपैठियों पर गलत जानकारी देने को लेकर हाई कोर्ट नाराज
असल में झारखंड के साहिबगंज में चार बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान की गई है। इसके बावजूद उपायुक्त ने किसी भी घुसपैठ से इनकार किया है। वहीं केंद्र सरकार ने कहा है कि बांग्लादेशी घुसपैठिए वास्तव में संथाल परगना में घुस आए हैं, जिससे क्षेत्र में एक विशिष्ट समुदाय की आबादी में बढ़ोतरी हो रही है। इसी पर हाई कोर्ट ने कहा कि उपायुक्त की ओर से संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठिए नहीं होने की गलत जानकारी देना दुर्भाग्यपूर्ण है।
असल में हाई कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से शपथ दाखिल कर कहा गया है कि एनआरसी के जरिए संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जा सकता है।
झारखंड हाई कोर्ट ने गलत जानकारी देने के कारण उपायुक्त के खिलाफ न्यायालय की अवमानना की कार्रवाई करने की भी बात कही है। हालांकि कोर्ट ने कहा है कि हमारा प्राथमिक उद्देश्य संथाल परगना में फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के जरिए बांग्लादेशियों की घुसपैठ हो रही है या नहीं, इसकी जानकारी प्राप्त करनी है। हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर बांग्लादेशी घुसपैठिए संथाल परगना में अवैध तरीके से आ रहे हैं तो इसपर रोक लगाना बहुत जरूरी है।
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बांग्लादेशी घुसपैठ की जांच के लिए हाई कोर्ट ने पैनल बनाने का दिया आदेश
हाई कोर्ट ने संथाल परगना में बांग्लादेशी प्रवासियों की घुसपैठ की जांच के लिए एक पैनल के गठन का आदेश दिया था। ख्य न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की पीठ ने कहा था कि कोर्ट परस्पर विरोधी रुख को देखते हुए घुसपैठ के मुद्दे का अपने आप आकलन करने की स्थिति में नहीं है, इसलिए इसकी जांच के सिए पैनल बनाया जाना चाहिए।
इधर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने झारखंड में कुछ बांग्लादेशी महिलाओं की संदिग्ध घुसपैठ और तस्करी के मामले की जांच के लिए मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया है।
बांग्लादेशी घुसपैठ: संथाल परगना में तेजी से घट रही है आदिवासियों की संख्या!
झारखंड में बांग्लादेश से अवैध अप्रवासियों की संख्या चिंता का विषय रही है। राज्य में बिना अनुमति के सीमा पार करने वाले व्यक्तियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो रही है। जिससे स्थानीय आदिवासी समुदायों और संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ गई है। झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या पिछले कुछ सालों में सबसे ज्यादा संथाल परगना में बढ़ी है। संथाल परगना में आने वाले पाकुड़ साहिबगंज, जामताड़ा, देवघर, दुमका जैसे जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।
संथाल परगना में आदिवासियों की आबादी 42 फीसदी से घटकर 28 फीसदी हो गई है। पाकुड़ और साहिबगंज जिले में 2011 तक मुस्लिम समुदाय की आबादी 35 फीसदी बढ़ी है। वहीं संथाल परगना में मुस्लिम समुदाय की आबादी 13 प्रतिशत बढ़ गई है।

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बांग्लादेशी घुसपैठ की वजह से आदिवासी अधिकार संकट में!
झारखंड में आदिवासी अधिकार संकट में है। आदिवासी क्षेत्रों में घुसपैठियों की बढ़ती संख्या के कारण स्थानीय आदिवासी समुदायों की भूमि का अधिग्रहण हो रहा है। इससे आदिवासियों की पारंपरिक जीवनशैली और संसाधनों पर खतरा बढ़ा है।
इतना ही नहीं घुसपैठियों की उपस्थिति से आदिवासी समुदायों में सामाजिक तनाव बढ़ रहा है। स्थानीय संघर्ष और विवाद बढ़ने लगे हैं। घुसपैठियों के कारण स्थानीय रोजगार के अवसर भी आदिवासियों के लिए कम हो रहे हैं। आदिवासी समुदाय जो पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा था, अब उन्हें और भी अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
क्या वोटबैंक की लालच में चुप है हेमंत सोरेन सरकार?
हेमंत सोरेन सरकार जो खुद को आदिवासियों का हितैशी कहती है लेकिन घुसपैठियों के मामलों पर चुप्पी साधे रखी है। हेमंत सोरेन इस मुद्दे पर बयान तो देते हैं लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं करते हैं। आलोचकों का कहना है कि सरकार को इस समस्या को सुलझाने के लिए अधिक कठोर कदम उठाने चाहिए थे लेकिन वो वोटबैंक के लिए इसके खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं।
सरकार पर आरोप है कि वह आदिवासी वोटों के लिए कुछ योजनाओं का लाभ उठा रही है, लेकिन वास्तव में आदिवासी हितों की अनदेखी कर रही है। ऐसी योजनाएं जो वास्तविकता में आदिवासी समुदाय की भलाई के लिए बनाई गई हैं, उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए ही लागू किया जा रहा है।
विपक्षी दलों और आदिवासी संगठनों ने सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने मांग की है कि सरकार घुसपैठियों की समस्या को गंभीरता से ले और आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए। हेमंत सोरेन सरकार को यह समझना चाहिए कि आदिवासी हितों की अनदेखी करना न केवल सामाजिक न्याय के खिलाफ है, बल्कि राज्य की स्थिरता के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है।
झारखंड में सरकार ने जल्द ही इस मुद्दे का समाधान नहीं किया, तो इसका नकारात्मक प्रभाव झारखंड की सामाजिक और राजनीतिक संरचना पर पड़ेगा। आदिवासी समुदाय की आवाज को सुनना और उनके अधिकारों की रक्षा करना जरूरी है ताकि राज्य का विकास सभी वर्गों के लिए समान रूप से हो सके।
आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति भी दयनीय है। सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। पूछा जा रहा है कि ये योजनाएं सच में आदिवासी समुदाय के लिए प्रभावी हैं, या केवल दिखावे के लिए बनाई गई हैं?
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