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झारखंड में भाजपा क्यों हारी? उम्मीदवारों ने समीक्षा बैठक में गिनाये 5 मुख्य कारण

Jharkhand BJP Defeat Reason: झारखंड में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद पार्टी नेताओं ने हार के प्रमुख कारणों पर अपनी राय साझा की है। पार्टी के उम्मीदवारों ने इस हार के लिए पांच मुख्य कारणों की पहचान की है, जिनमें "अत्यधिक निर्भरता" जैसे मुद्दे भी शामिल हैं, जहां बाहरी नेताओं जैसे असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान पर ज्यादा भरोसा किया गया, बजाय झारखंड के स्थानीय नेताओं जैसे बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा पर।

भाजपा नेताओं के अनुसार हार के पांच प्रमुख कारण

(1)बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा: घुसपैठ के मुद्दे को अधिक जोर-शोर से उठाया गया, जो केवल संथाल परगना क्षेत्र में ही प्रभावी था, जबकि अन्य क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दों को नजरअंदाज किया गया।

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(2)आदिवासी और ओबीसी समुदायों का कमजोर प्रतिनिधित्व: पार्टी ने इन समुदायों से नया चेहरा पेश नहीं किया, जिससे उन्हें स्थानीय स्तर पर समर्थन प्राप्त नहीं हो सका।

(3)हेमंत सोरेन सरकार की लोककल्याण योजनाओं का प्रभाव: राज्य सरकार की "मैयां सम्मान योजना" जैसी लोकलुभावन योजनाओं का असर पड़ा।

(4)स्थानीय नेताओं की उपेक्षा: भाजपा ने अपनी रणनीति में राज्य के नेताओं जैसे मरांडी और मुंडा पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय बाहरी नेताओं पर ज्यादा निर्भरता बनाई।

(5)आंतरिक विघटन: पार्टी के भीतर से मिली रिपोर्ट्स के अनुसार, आंतरिक मतभेदों और "आंतरिक तोड़फोड़" का भी चुनाव परिणाम पर असर पड़ा।

बीएल संतोष की बैठक में उठे मुद्दे
भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोश, राज्य इकाई के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी और अन्य नेताओं के साथ शनिवार को रांची में हुई बैठक में इन मुद्दों पर चर्चा की गई। उम्मीदवारों ने कहा कि पार्टी ने संथाल परगना में घुसपैठ के मुद्दे को तो जोर-शोर से उठाया, लेकिन अन्य क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दों को न उठाना पार्टी के लिए हानिकारक साबित हुआ। वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और झारखंड लोक कांग्रेस मोर्चा (JLKM) ने आदिवासी पहचान पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया।

स्थानीय नेताओं की उपेक्षा पर सवाल
चर्चा में यह भी सामने आया कि भाजपा ने राष्ट्रीय नेताओं पर ज्यादा निर्भरता दिखाई, जबकि मरांडी और मुंडा जैसे स्थानीय चेहरों को पर्याप्त प्रचार नहीं मिला। पार्टी नेताओं का मानना है कि झारखंड की जनता के लिए झारखंडी पहचान अहम है, और बाहरी नेताओं को आगे करने की बजाय स्थानीय नेताओं को प्रमुखता दी जानी चाहिए थी।

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JLKM का प्रभाव
बैठक में यह भी बताया गया कि JLKM ने 14 सीटों पर भाजपा के चुनावी समीकरण को प्रभावित किया, और पार्टी को उम्मीद नहीं थी कि नए नेता और उनकी पार्टी इस तरह के असर डालेंगे।

भविष्य की रणनीति
भा.ज.पा. के नेताओं ने आगामी चुनावों के लिए आदिवासी और ओबीसी नेताओं को तैयार करने की जरूरत को भी महसूस किया, ताकि राज्य सरकार की लोकप्रियता को चुनौती दी जा सके। पार्टी के अंदर भी युवा नेताओं को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया, क्योंकि झारखंड की जनता ने हमेशा युवा नेतृत्व पर विश्वास जताया है।

ज्ञात हो कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की अगुवाई में गठबंधन ने 56 सीटें जीतकर ऐतिहासिक दूसरी बार सत्ता में वापसी की, जबकि भाजपा को 21 सीटें मिलीं, जो 2019 के चुनाव से चार कम हैं। भाजपा केवल 28 आदिवासी सीटों में से एक सीट जीतने में सफल रही।

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