Jammu Kashmir Chunav: अपने गढ़ में ही क्यों गुम हो रही PDP, दक्षिण कश्मीर में जमात,NC का कितना असर?

Jammu Kashmir Chunav: दक्षिण कश्मीर में सोमवार (16 सितंबर,2024) को चुनाव प्रचार का खत्म हो गया। यह इलाका पहले महबूबा मुफ्ती की अगुवाई वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन, अब पीडीपी का असर फीका हुआ है। हालांकि, महबूबा ने पार्टी के पुराने दिन वापसी के लिए भरपूर कोशिशें की हैं, लेकिन लोकसभा चुनावों के परिणामों से अंदाजा लगता है कि पार्टी को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

चुनावी रैलियों में महबूबा ने पार्टी के पुराने दिनों को याद करवाने की कोई कमी नहीं छोड़ी है। यह याद दिलाने की कोशिश की है कि 2002 के पार्टी के पहले चुनाव में कैसे यहां के 16 विधायकों के दम पर पोटा जैसे कानून खत्म करवाने में मदद मिली। उनके मुताबिक यहां से मिले वोट की मदद से जम्मू-कश्मीर का शोषण खत्म करने में सहायता मिली।

kashmir chunav

दक्षिण कश्मीर पीडीपी का गढ़ रहा है
दक्षिण कश्मीर में अनंतनाग, कुलगाम, शोपियां और पुलवामा जैसे जिले हैं, जहां 2002 में अकेले पीडीपी को 16 में से 10 सीटें मिली थीं। 2008 में ही यह संख्या बढ़कर 12 हो गई और 2014 में उसे 11 सीटें सिर्फ यहीं मिलीं। लेकिन, 2014 में भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद से पीडीपी के हाथ तंग होने शुरू हो गए। 18 सितंबर को पहले चरण में दक्षिण कश्मीर की इन 16 सीटों पर चुनाव है।

2019 के लोकसभा चुनाव से पीडीपी का खिसकने लगा जनाधार
2019 का लोकसभा चुनाव पुलवामा आतंकी हमले के साए में हुआ था, जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हुए थे। मुफ्ती यहीं से खुद चुनाव मैदान में थीं और 16 विधानसभा क्षेत्रों में से उनकी पीडीपी को 8 में बढ़त तो जरूर मिली थी, लेकिन मतदान इतना कम हुआ था कि वह नेशनल कांफ्रेंस के पहली बार के प्रत्याशी हसनैन मसूदी से हार गईं।

2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीपी का हुआ पूरी तरह से सफाया
इस साल के लोकसभा चुनाव में भी कहानी नहीं बदली। अब यह लोकसभा क्षेत्र अनंतनाग-राजौरी बन गया, जिसमें विधानसभा की 18 सीटें शामिल हो गईं। महबूबा मुफ्ती इनमें से सिर्फ 3 सीटों पर ही बढ़त बना सकीं और नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन के मियां अल्ताफ ने 15 क्षेत्रों में बढ़त लेकर उन्हें फिर से हरा दिया। एक समय पीडीपी के प्रभाव से जिस दक्षिण कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस साफ हो चुका था, उसने अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई है।

पीडीपी याद दिला रही है अपना पुराना कार्यकाल
पीडीपी को लगता है कि यह विधानसभा चुनाव है और बीते 10 वर्षों में यहां के हालात बदल चुके हैं। पीडीपी के युवा नेता वाहीद उर रहमान पारा को लगता है कि पीडीपी ने अपने पहले के कार्यकाल में जो 'लोकप्रिय' फैसले लिए थे, उससे परिस्थितियां बदल सकती हैं। महबूबा भी अपने भाषणों में प्रदर्शनकारियों पर से 12,000 एफआईआर हटाने और पुलिस टास्क फोर्स को भंग करने जैसे फैसलों की याद दिला रही हैं।

दक्षिण कश्मीर में आतंकवाद बहुत ज्यादा सक्रिय था
दक्षिण कश्मीर में कभी आतंकवाद बहुत ज्यादा सक्रिय था। इसमें पीडीपी ने जिस तरह से 'नरम अलगाववाद' की नीति अपनाई थी,कहते हैं कि उसका उसे काफी फायदा मिला था। इस वजह से कांग्रेस और उसकी सहयोगी कांग्रेस हाशिए पर चली गई थी। इन्हें पिछले कई चुनावों से मुश्किल से दो से तीन सीटें ही मिलती थीं। सिर्फ कुलगाम में सीपीएम के एम वाई तारिगामी चार बार से अपनी सीट बचाते रहे हैं।

बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद पीडीपी का खिसकने लगा जनाधार?
इस बार नेशनल कांफ्रेंस के साथ गठबंधन में कांग्रेस घाटी में जो 8 सीटें लड़ रही है, उनमें से 4 सीटें दक्षिण कश्मीर में ही है। दक्षिण कश्मीर के एक नेशनल कांफ्रेंस नेता का कहना है, 'बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़कर पीडीपी ने उसके साथ हाथ मिला लिया था, इससे हमारे लिए एक अवसर खुल गया.....इस बार हम दोनों के बीच एक कड़ा मुकाबला होगा।'

पीडीपी को अभी भी है कहानी पलटने की उम्मीद
लेकिन, वरिष्ठ पीडीपी नेता नईम अख्तर का कहना है कि 'पीडीपी के पुराने कैडर जो पहले चुप हो गए थे, वह अब सक्रिय होते देखे जा सकते हैं। चुनावी रैलियों में युवाओं की मौजूदगी इसका प्रमाण है। 2019 के बाद कुछ नेताओं ने जो पाला बदल लिया था, वह पार्टी में वापस आ चुके हैं और कुछ और आना चाहते हैं।'

जमात की उपस्थिति से दक्षिण कश्मीर में बदल सकता है समीकरण
क्या पीडीपी खोई हुई जमीन वापस पा रही है या फिर नेशनल कांफ्रेंस ने अपनी पैठ बढ़ा ली है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जमात-ए-इस्लामी इस चुनाव में कितनी बड़ी भूमिका निभा पाती है। 1987 में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के नाम से चुनाव लड़ने वाला यह प्रतिबंधित संगठन इस बार निर्दलीयों और समान विचार के समर्थक प्रत्याशियों को सपोर्ट कर रहा है। माना जाता है कि उस चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस ने जबर्दस्त धांधली की थी, जो आतंकवाद के विस्फोट का मुख्य कारण बन गया।

इस बार जमात कम से कम 10 निर्दलीय प्रत्याशयों को समर्थन दे रहा है, जिनमें से चार दक्षिण कश्मीर में हैं। ये हैं- पुलवामा, जैनपोरा, कुलगाम और देवसार। हालांकि, पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस दोनों का दावा है कि जमात का यहां कोई खास असर नहीं है।

दक्षिण कश्मीर के एक वरिष्ठ नेशनल कांफ्रेंस नेता ने कहा, 'जमात की यह लीडरशिप, जमात के कैडरों को भी मंजूर नहीं है।' 'तथ्य यह है कि जमात के मूल कैडर पहले वोट नहीं देते रहे और वे आज भी वोट नहीं डालेंगे।'

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