J&K Polls 2024: कश्मीर में जहां कभी 'वर्जित' था मतदान, वहां लोकतंत्र के महापर्व में शामिल होकर क्या बोले युवा?
Jammu Kashmir Chunav 2024: जम्मू-कश्मीर में इस बार का विधानसभा इस मायने में बहुत अलग है कि वहां ऐसे लोगों को भी मतदान का अवसर मिला है, जो भय और दहशत की वजह से पहले चाह कर भी लोकतंत्र के महापर्व में शामिल नहीं हो पाते थे। खासकर कश्मीर घाटी में जहां चुनाव बहिष्कार के आह्वान को नकारने की किसी में हिम्मत नहीं होती थी।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि इस बदलाव के बारे में स्थानीय युवाओं की क्या प्रतिक्रिया है। मसलन, श्रीनगर के नौहट्टा इलाके के एक मतदान केंद्र पर वोट डालने पहुंचे 39 वर्षीय इशाक अहमद भट के लिए तो मानो इससे बड़ा गौरव का पल हो ही नहीं सकता। उन्हें इस बात की खुशी है कि तमाम चुनौतियों के बावजूद लोकतंत्र के प्रति उनकी आस्था आखिरकार रंग ले आई है।

आतंकवादियों-अलगाववादियों के गढ़ रहे इलाके में लोकतंत्र की जीत
उनका कहना है कि उन्होंने हमेशा ही लोकतांत्रिक राजनीति का समर्थन किया था, जिसके चलते कई बार उनके खामने खतरे भी पैदा हुए। लेकिन, अब जिस तरह से लोग वोट डालने निकल रहे हैं, उससे उन्हें अपने विचारों की जीत महसूस हो रही है। श्रीनगर का नौहट्टा इलाका कभी आतंकवादियों और अलगवावादियों का गढ़ हुआ करता था।
इशाक कहते हैं, 'दूसरों की तरह मैंने अलगाववाद या आतंकवाद को सपोर्ट नहीं किया। मैं मुख्यधारा में शामिल हुआ, क्योंकि मुझे लोकतंत्र और चुनावी राजनीति में भरोसा है। मैंने पत्थर नहीं फेंके, बल्कि श्रीनगर में मुख्यधारा की राजनीति को मजबूत करने के लिए काम किया।'
जहां कभी मतदान के बारे में बात करना भी गुनाह था!
वे कहते हैं कि आतंकवाद के दौरान 'मतदान' के बारे में बात करना भी 'वर्जित' था। लेकिन, सभी चुनौतियों के बावजूद मैंने मुख्यधारा की राजनीति नहीं छोड़ी।
'आज हर कोई वोटिंग के लिए बाहर आ रहा है'
उनके मुताबिक, 'मुझे बहुत सारी धमकियां मिलीं। काफी समय तक मुझे छिपके रहना पड़ा। मेरी सुरक्षा के लिए मेरा परिवार चाहता था कि मैं मुख्यधारा की राजनीति छोड़ दूं, लेकिन मैंने नहीं माना और आज देखिए हर कोई वोटिंग के लिए बाहर आ रहा है और लोकतंत्र में भरोसा जता रहा है।'
वे साफ तौर पर कहते हैं मुद्दे बंदूक और बुलेट से नहीं वोट और बातचीत से सुलझाए जा सकते हैं। उन्होंने बताया, '2008 से लेकर आज के दिन तक मैंने सभी चुनावों में हिस्सा लिया। मैं पार्टियों के लिए बूथ एजेंट, पोलिंग एजेंट और इलेक्शन ऑब्जर्वर के तौर पर काम किया।' वे नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी से भी जुड़े रहे हैं।
अभी वे एक निर्दलीय उम्मीदवार के साथ जुड़े हुए हैं और श्रीनगर की खानयार सीट पर अपने प्रत्याशी के साथ नेशनल कांफ्रेंस के दिग्गज अली मोहम्मद सागर की कड़ी टक्कर होने का दावा कर रहे हैं।
पहली बार श्रीनगर की एक सीट पर वोट डालने पहुंचा एक पंडित परिवार
जहां एक तरफ इशाक को इस बात का गर्व है कि जम्मू कश्मीर की जनता ने आखिरकार लोकतंत्र में ही विश्वास जताया है। वहीं, एक कश्मीरी पंडित परिवार पहली बार घाटी की अपनी सीट पर वोट देने के लिए दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले से आया है।
अब कोई डर नहीं है- श्रीनगर में वोट डालने वाली पंडित महिला
पंडित परिवार की एक महिला लीना अंबरदार कहती हैं, 'अब कोई डर नहीं है और यह पहली बार है कि हम अपने चुनाव क्षेत्र के मतदान केंद्र में वोट डाल रहे हैं। पहले हम जम्मू के प्रवासी कैंप में वोट डालते थे।' वो अपनी बहन साधना कौल और पति के साथ श्रीनगर की जैदीबल सीट के रैनाबारी पोलिंग स्टेशन पर वोट डालने पहुंचीं थीं।
'घाटी में अब शांति बहाल हो रही है'
लीना कहती हैं, 'हमें उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में और भी ऐसे लोग होंगे जो अपने विधानसभा क्षेत्र में वोट डालने पहुंचेंगे। अगर यहां कोई डर होता तो हम यहां वोट डालने नहीं आते। घाटी में शांति बहाल हो रही है और इसका श्रेय लेफ्टिनेंट गवर्नर के प्रशासन को जाता है।'












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