Jammu Kashmir Chunav: त्रिशंकु विधानसभा! किस उम्मीद पर टिकी है गुलाम नबी आजाद की आगे की राजनीति?
Jammu Kashmir Chunav: पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने जब दो साल पहले कांग्रेस छोड़कर डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी (DPAP) बनाई थी, तब लग रहा था कि वह अपनी पुरानी पार्टी की सियासी कब्र खोदने की तैयारी में हैं। लेकिन, आज की तारीख में आजाद को अपनी ही सियासी जमीन बचाए रखने के लाले पड़ रहे हैं।
डीपीएपी जम्मू कश्मीर की 90 सीटों में से लगभग 19 सीटों पर ही चुनाव मैदान में है और उनमें से भी अधिकतर सीटें जम्मू डिविजन की हैं। चुनाव से पहले तक आजाद को एक बड़ा राजनीतिक किरदार माना जा रहा था, लेकिन जब उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से अपने चुनाव प्रचार करने की स्थिति को खुद ही संदिग्ध बना दिया, तब सबसे ज्यादा मायूसी उनकी पार्टी के बचे-खुचे कार्यकर्ताओं और नेताओं को हुई।

कुछ सीटों पर डीपीएपी के प्रदर्शन को लेकर आजाद आशावान
वैसे आज की तारीख में डीपीएपी भले ही गिनी-चुनी सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है, लेकिन कुछ सीटें ऐसी हैं, जिसको लेकर गुलाम नबी आजाद को यकीन है कि मतगणना के बाद की परिस्थितियों में एक बार फिर से जम्मू कश्मीर की राजनीति में उनका सियासी कद बढ़ सकता है।
डोडा सीट पर आजाद की पार्टी ने लगाया है पूरा जोर
इसी उम्मीद में गुलाम नबी कुछ खास उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए भी निकल रहे हैं, जिनमें से एक जम्मू की डोडा विधानसभा सीट भी शामिल है। डोडा में आजाद की पार्टी ने पूर्व मंत्री अब्दुल माजिद वानी को उतारा है, जो यहां से 2002 और 2008 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं।
लोकसभा चुनावों में रही बहुत निराशाजनक प्रदर्शन
लोकसभा चुनावों में डीपीएपी ने अनंतनाग-राजौरी और उधमपुर लोकसभा सीटों से उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन दोनों ही जगहों पर अपनी जमानतें बचाने में नाकाम हो गए। उसके बाद से आजाद की पार्टी का संकट और गहराता ही गया है।
खासकर जब खराब सेहत की वजह से आजाद ने चुनाव प्रचार करने में नाकामी जताई तो पार्टी को और झटका लगा और इसके चार उम्मीदवारों ने नामांकन तक वापस ले लिए। ये सारे जम्मू की चेनाब घाटी की सीटें हैं, जिसे आजाद अपना गढ़ समझते रहे हैं।
चेनाब घाटी के इलाके में भी कमजोर पड़ी आजाद की पार्टी
चेनाब घाटी के इलाके में तीन जिले हैं- किश्तवाड़, डोडा और रामबन। आज की तारीख में आजाद की पार्टी के पास भद्रवाह में भी डीपीएपी का प्रत्याशी नहीं हैं, जो गुलाम नबी आजाद का गृहनगर है। जब वे 2006 से 2008 के बीच जम्मू कश्मीर के सीएम थे तो यहीं से विधायक बने थे। वे आज भी अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों के नाम पर ही वोट देने की अपील कर रहे हैं।
आजाद को कुछ उम्मीदवारों की जीत पर पक्का भरोसा
जम्मू-कश्मीर में जिन दलों को बीजेपी का मौन सहयोगी बताया जा रहा है, उनमें गुलाम नबी आजाद की पार्टी भी शामिल है। इसी वजह से नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने उनसे बराबर दूरी बनाकर रखी है। लेकिन, आजाद को भरोसा है कि डोडा के वानी जैसे उनके कुछ ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनके चुनाव जीतने की पूरी संभावना है।
त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति पर ही टिकी है गुलाम नबी की सियासी उम्मीद
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार उनका अनुमान है कि जम्मू कश्मीर में इस बार भी त्रिशंकु विधानसभा बनेगी, क्योंकि किसी भी दल या गठबंधन को बहुमत मिलने की संभावना नहीं है। ऐसे में आजाद को उम्मीद है कि अगर उनकी दल को कुछ भी सीटें मिल गईं तो चुनाव के बाद की परिस्थितियों में एक बार फिर से उनका सियासी महत्त्व बढ़ सकता है और वे फिर से लाइमलाइट में आ सकते हैं।
वैसे नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की ओर से आजाद की पार्टी को चाहे जिस भी चश्मे से देखा जा रहा हो, उनके अपने कार्यकर्ता उनकी बीजेपी से कथित तालमेल को गलत प्रोपेगेंडा से ज्यादा कुछ नहीं मानते हैं।
एक डीपीएपी कार्यकर्ता का कहना है, 'हम हमेशा उनके (आजाद) साथ खड़े रहे हैं। वानी साहब भी लोकप्रिय हैं। अगर आजाद साहब ने जोरदार प्रचार किया होता तो यह सीट जीतना बहुत ही आसान हो जाता। लेकिन, हम फिर भी जीतेंगे।' 2014 के विधानसभा चुनाव में डोडा सीट बीजेपी जीती थी और कांग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर वानी दूसरे नंबर पर रहे थे।
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