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Article 370 Abrogation: मौतों के आंकड़े झूठ नहीं बोलते, अर्टिकल 370 हटने के बाद कितना बदला कश्मीर?

Article 370 Abrogation: जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्छेद 370 हटे 5 अगस्‍त 2025 को पूरे छह साल पूरे हो चुके हैं। केंद्र सरकार इसे एक ऐतिहासिक कदम बताती है। सरकार के अनुसार कश्मीर में विकास, निवेश और स्थायी शांति की दिशा में बढ़ाया गया ये निर्णायक कदम था।

सरकार बार-बार दावा करती है कि अब कश्मीर में हालात बेहतर हैं, हिंसा में भारी गिरावट आई है और घाटी विकास के रास्ते पर है लेकिन हाल ही में पहलगाम में हुआ आतंकी हमला, जिसमें सुरक्षाबलों पर घात लगाकर हमला किया गया, इस दावे पर फिर सवाल खड़े कर दिए है। सवाल उठ रहा है क्या कश्मीर सच में बदल रहा है या फिर हिंसा ने केवल अपना रूप और रणनीति बदली है?

Article 370 Abrogation

हालांकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में बीते छह वर्षों में सुरक्षा व्यवस्था और आतंकवाद के खिलाफ केंद्र सरकार की कड़ी रणनीति का सकारात्मक असर दिखाई देने लगा है। हाल ही में जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में आतंकवाद से संबंधित मौतों की संख्या में 615 की गिरावट दर्ज की गई है। यह आंकड़ा केंद्र सरकार की "ज़ीरो टॉलरेंस" नीति और घाटी में लगातार बेहतर होती स्थिति का प्रमाण माना जा रहा है।

बीते छह वर्षों में आतंकवाद से संबंधित मौतों में 615 की कमी

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के अनुसार, 5 अगस्त 2019, जिस दिन अनुच्छेद 370 और 35ए को समाप्त किया गया था। तब से लेकर 4 अगस्त 2025 तक आतंकवाद से संबंधित घटनाओं में कुल 1,230 लोगों की मौत हुई है। यह आंकड़ा संवैधानिक बदलाव से पहले के छह वर्षों की तुलना में 33 प्रतिशत (615 लोग) कम है, जब इसी अवधि में 1,845 लोगों ने अपनी जानें गंवाई थीं।

कितने आतंकी मारे गए?

अनुच्छेद 370 हटने से पहले की कुल मौतों में 243 नागरिक, 475 सुरक्षाकर्मी और 1,121 आतंकवादी शामिल थे। इसकी तुलना में, 2019 के बाद के आंकड़ों में 189 नागरिक, 204 सुरक्षाकर्मी, 833 आतंकवादी और चार ऐसे व्यक्ति शामिल हैं जिनकी पहचान अभी भी अपुष्ट है।

2018 से 2025 के बीच किस साल हुई सबसे अधिक मौतें?

  • आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि पिछले एक दशक में 2018 में आतंकवाद से संबंधित मौतों की संख्या सबसे अधिक थी, जब 452 लोग मारे गए थे, जिनमें 86 नागरिक और 271 आतंकवादी शामिल थे।
  • अनुच्छेद 370 हटने के ठीक बाद के महीनों में, यानी अगस्त से दिसंबर 2019 तक, केवल 50 मौतें दर्ज की गईं, जो उसी वर्ष के पहले सात महीनों में हुई 233 मौतों की तुलना में एक बड़ी गिरावट थी।
  • वर्ष 2020 में मौतों में थोड़ी वृद्धि देखी गई, जब 321 मौतें हुईं, जिसका मुख्य कारण गहन आतंकवाद विरोधी अभियान थे, जिसके परिणामस्वरूप 232 आतंकवादी मारे गए।
  • तब से, वार्षिक मौतों की संख्या 275 से नीचे बनी हुई है, जिसमें 2023 और 2024 ने एक दशक से अधिक समय में सबसे कम आंकड़े दर्ज किए हैं।
  • 2023 तक यह संख्या घटकर 134 हो गई और 2024 में 127 पर आ गई।
  • 2025 में अब तक 71 मौतें दर्ज की गई हैं, जिनमें 28 नागरिक, 10 सुरक्षाकर्मी और 32 आतंकवादी शामिल हैं।

क्‍या कश्‍मीर के नागरिक पहले से सुरक्षित हैं?

नागरिकों की मौतों में भी कमी आई है, हालांकि यह गिरावट सीधी नहीं रही। 2023 में केवल 12 नागरिक मारे गए, जो 12 वर्षों में सबसे कम वार्षिक संख्या थी। यह संख्या 2024 में बढ़कर 31 हो गई, और इस साल अब तक 28 नागरिक मारे जा चुके हैं। 2025 में हुई मौतों में से 26 एक ही घटना से संबंधित थीं-22 अप्रैल को पहलगाम में हुआ आतंकवादी हमला।

क्‍या कहते हैं पुलिस और शीर्ष अधिकारी?

गिरती हुई संख्याओं के बावजूद, शीर्ष अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि आतंकवादी खतरे की प्रकृति बदल गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने बार-बार कहा है कि क्षेत्र में आतंकवाद अब लगभग पूरी तरह से विदेशी तत्वों द्वारा चलाया जा रहा है।

ईटीवी की रिपोर्ट के अनुसार एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "विदेशी आतंकवादियों की उपस्थिति और बार-बार घुसपैठ के प्रयास लगातार चुनौतियां हैं।" उन्होंने यह भी कहा, "लेकिन खुफिया-आधारित अभियानों और बढ़ी हुई सामुदायिक भागीदारी ने शांति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।"

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