Rajasthan News: जातीय समीकरणों पर केंद्रित रहा राजस्थान का चुनाव, सचिन पायलट की भूमिका को लेकर चर्चा तेज
Rajasthan News: राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट टोंक विधानसभा से दूसरी बार विधायक चुने गए हैं। राजस्थान में कांग्रेस में सचिन पायलट बड़ी भूमिका के नेता माने जाते हैं। प्रदेश में टोंक को जटिल विधानसभा सीट माना जाता है। सचिन पायलट 2018 के विधानसभा चुनाव में यहां पहले गैर मुस्लिम उम्मीदवार थे। तब उन्होंने इतिहास रचते हुए 54 हजार से ज्यादा वोटो से जीत हासिल की थी। टोंक से दूसरी बार वे लगभग 29000 मतों से जीते हैं। क्षेत्र के मतदाताओं का आभार जताते हुए सचिन पायलट ने ट्वीट कर लिखा कि जनता ने मुझे फिर आशीर्वाद दिया है। टोंक में कांग्रेस की बड़ी जीत हुई है। आप सभी के सहयोग से टोंक में विकास की गति जारी रहेगी। प्रदेश में 115 सीट पाकर बीजेपी ने बहुमत हांसिल किया है। अब सचिन पायलट की राजस्थान और कांग्रेस में क्या भूमिका रहेगी। इसे लेकर सियासी गलियारों में चर्चा तेज हो गई है।
कांग्रेस में पायलट की भूमिका को लेकर चर्चा
राजस्थान में कांग्रेस की सरकार के 5 साल पूरे होने और अच्छे कार्यकाल के बावजूद सरकार रिपीट नहीं हो सकी। यह नतीजा कांग्रेस ही नहीं सचिन पायलट के लिए भी अच्छे नहीं माने जा रहे हैं। अब सचिन पायलट की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। पायलट को लेकर कांग्रेस में क्या संभावनाएं हो सकती हैं। 2018 के प्रदर्शन के बाद अब पार्टी में उनकी सौदेबाजी की ताकत बची है या नहीं। क्या अब पार्टी सचिन पायलट को प्रदेश की राजनीति में बड़ी भूमिका देगी या उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पद देकर फोकस करने के लिए उनका उपयोग किया जाएगा। यह सब बातें भविष्य के गर्भ में है। लेकिन प्रदेश में अभी भी सचिन पायलट चर्चा का विषय है।

सचिन पायलट को लेकर गुर्जर समुदाय की नाराजगी
राजनीति के जानकार बताते हैं कि राजस्थान में 2018 के विधानसभा चुनाव में गुर्जरों ने एकजुट होकर कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया था। इसकी अहम वजह सचिन पायलट बनकर उभरे थे। लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में सचिन पायलट फैक्टर और गुर्जर समुदाय का असर दिखा है। वे कहते हैं इस बार गुर्जरों ने चुनाव में उतना बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं लिया। इसका सीधे तौर पर फायदा भाजपा को हुआ है। इसके अलावा साल 2020 में गहलोत सरकार के खिलाफ विद्रोह कर मानेसर रिजॉर्ट में डेरा डालें 15 विधायकों में से ज्यादातर को इस बार टिकट दिया गया। लेकिन आधे ही जीत पाए हैं। इसका असर भी पायलट के भविष्य पर नजर आएगा।
आजादी के बाद कांग्रेस का तीसरा खराब प्रदर्शन
राजस्थान में आजादी के बाद तीसरी बार कांग्रेस का सबसे खराब प्रदर्शन सामने आया है। 2023 के चुनाव में कांग्रेस 200 में से 69 सीटों पर ही जीत पाई। इससे पहले के चुनाव में कांग्रेस 2018 में 21 और 2003 में 56 सीटों तक ही सिमट कर रह गई। इन चुनाव के दौरान भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का ही कार्यकाल था। कांग्रेस अपनी हार की अहम वजह ध्रुवीकरण को मान रही है। खुद अशोक गहलोत भी ऐसा बयान दे चुके हैं। राजनीति से जुड़े लोग बताते हैं कि कांग्रेस इसे एक बहाने के रूप में इस्तेमाल कर रही है। 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बहुत अच्छी सीटें हांसिल की थी।
गहलोत सरकार के 25 में से 18 मंत्री चुनाव हारे
हाल ही में राजस्थान में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में तमाम दावों के बावजूद कांग्रेस को हार का सामना देखना पड़ा है। चुनाव के दौरान या उससे पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार के कामकाज की तारीफ करते थक नहीं रहे थे। लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो गहलोत सरकार के 25 में से 18 मंत्री चुनाव हार गए। जानकार बताते हैं कि तीन मंत्रियों ने चुनाव लड़ने से ही इनकार कर दिया। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के एमओएस रैंक के 6 सलाहकारों में से पांच सलाहकार चुनाव हार गए। खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के जिले जोधपुर में कांग्रेस 10 में से 8 सीटें हार गई। पार्टी राजस्थान में वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाई जैसा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत दावा करते थे।
राजस्थान के चुनाव में दिखा जातीय समीकरणों का असर
राजस्थान की विधानसभा चुनाव में पूरी तरह जातीय समीकरणों का असर नजर आया। प्रदेश में दलित समुदाय से बीजेपी के 23 और कांग्रेस के 12 विधायक जीत कर आए। जाट समुदाय से बीजेपी के 14 और कांग्रेस के 17, राजपूत समुदाय से बीजेपी के 17 कांग्रेस का 1, ब्राह्मण समुदाय से बीजेपी के 12 और कांग्रेस के 4, आदिवासी समुदाय से बीजेपी के 16 और कांग्रेस के 12 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। जबकि गुर्जर समुदाय से बीजेपी के पास और कांग्रेस के तीन ही विधायक जीत सके हैं। राजनीति के जानकार बताते हैं कि इससे साफ है कि इस बार गुर्जर समुदाय ने कांग्रेस से मुंह मोड़ लिया था।












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