राजस्थान: प्रदेश में विधानसभा चुनाव में कितनी जमीन हांसिल कर पाएगा थर्ड फ्रंट, जानिए कैसी रहेगी सियासी गणित

राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पहले थर्ड फ्रंट को लेकर कई तरह की चर्चा है। राजस्थान की जनता तीसरे मोर्चे को विकल्प के तौर पर देखती तो है। लेकिन उतना समर्थन नहीं करती है।

third front

राजस्थान में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस बार विधानसभा चुनाव में प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य दलों की प्रदेश पर निगाह है। प्रदेश में आम आदमी पार्टी और एआईएमआइएम भी सक्रीय हैं। दोनों दल ज्यादातर सीटों पर अपने दावेदार उतारने का दावा कर रहे हैं। उधर, पिछले कुछ सालों में खुद की पार्टी बनाकर उभरे सांसद हनुमान बेनीवाल और बीटीपी जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप भी प्रदेश के सियासी समीकरणों को लेकर अपने दावे ठोक रहे हैं। इन तमाम दावों के बीच राजस्थान में इस बार विधानसभा चुनाव बड़ा ही दिलचस्प होने वाला है। खास तौर पर तब जब कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट सरकार रीपीट करने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। वहीं भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दम पर प्रदेश में बदलाव की परंपरा बरकरार रखने की कोशिश कर रही है।

निर्दलीय विधायकों का दबदबा

राजस्थान में मौजूदा सरकार में लगभग 13 निर्दलीय विधायक हैं। दो बीटीबी के विधायक और तीन आरएलपी के विधायक हैं। प्रदेश में जनता तीसरे मोर्चे को विकल्प के तौर पर देखती तो है। लेकिन इतना समर्थन नहीं करती है। इससे पहले हनुमान बेनीवाल और किरोड़ी लाल मीणा ने मोर्चा बनाकर तीसरे विकल्प की संभावनाएं तलाशी थी। लेकिन सफल नहीं हो सके। कुछ नेता अपने क्षेत्रीय प्रभाव के चलते बसपा से चुनाव लड़कर जीते। लेकिन उन्होंने सरकार को समर्थन कर दिया। राजनीति के जानकारों की मानें तो राजस्थान में तीसरे मोर्चे को लोग विकल्प के तौर पर देखते तो हैं। लेकिन समर्थन नहीं करते। यही वजह है कि तीसरे मोर्चे की कोई बड़ी संभावनाएं नजर नहीं आती है।

पार्टी प्रत्याशियों को हराने का विकल्प

राजस्थान में ज्यादातर निर्दलीय चुनाव उसी सूरत में लड़ा जाता है। जब पार्टी दावेदार का टिकट काट देती है। ऐसे में पार्टी प्रत्याशी को हराने के लिए वह बतौर बागी होकर चुनाव लड़ लेते हैं। राजनीति के जानकार मानते हैं कि अभी राजस्थान की जनता तीसरे विकल्प को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में प्रदेश में तीसरे मोर्चे की संभावना उतनी नहीं बनती। प्रदेश में जातीय समीकरणों और भौगोलिक स्थिति के हिसाब से भी यहां तीसरे मोर्चे का विकल्प नहीं बनता। राजनीति के टिप्पणीकार और वसुंधरा राजे विरोधी खेमा यह भी कहता हैं कि भाजपा द्वारा वसुंधरा राजे को पार्टी का चेहरा नहीं बनाए जाने पर वे बगावत कर अलग पार्टी बना सकती हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से पार्टी में जिस तरह वसुंधरा राजे को तरजीह मिल रही है। उससे साफ है कि वसुंधरा राजे ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगी। प्रदेश में इस साल होने वाले चुनाव में सीधा मुकाबला कांग्रेस भाजपा के बीच होगा। कुछ सीटों पर अन्य दल और निर्दलीय समीकरण प्रभावित करेंगे।

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