Rajasthan में भाजपा के प्रदेश संगठन के दावों की हवा निकली, पीएम और नड्डा की सभा में भीड़ नहीं जुटा पाई पार्टी

राजस्थान में जन आक्रोश यात्रा के शुभारम्भ पर भाजपा का प्रदेश संगठन भीड़ जुटाने में असफल रहा। पदाधिकारियों के हवाई दावों की पोल खुल गई है। 48 हजार बूथों पर मजबूत होने का दावा करने वाले नेता भीड़ नहीं जुटा पाए।

Rajasthan में भाजपा दावे तो बड़े करती है। लेकिन जमीन पर पार्टी हकीकत कुछ ओर है। हाल ही में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा राजस्थान में जन आक्रोश यात्रा का आगाज करने के लिए जयपुर आए। पार्टी के नेता उनकी सभा के लिए जयपुर जैसे महानगर में दो हजार लोग भी नहीं जुटा पाए। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जयपुर में सभा हो और उसमे भीड़ ना हो पाए, यह बड़ी बात है। इससे पहले सिरोही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा में भी भाजपा का प्रदेश संगठन भीड़ नहीं जुटा पाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर नाराजगी भी जाहिर की थी। ठीक वैसे ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी जयपुर में सभा में भीड़ नहीं होने से नाराज होकर दिल्ली लौटे हैं। राजस्थान में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा का मुकाबला राजस्थान में कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से है। ऐसे में पार्टी के कार्यक्रमों में भीड़ नहीं जुटना भाजपा के लिए अच्छा संकेत नहीं हैं। इससे भाजपा के प्रदेश संगठन, विशेषकर संगठन महामंत्री चंद्रशेखर की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

जन आक्रोश यात्रा के शुभारंभ पर भाजपा नहीं जुटा पाई भीड़

जन आक्रोश यात्रा के शुभारंभ पर भाजपा नहीं जुटा पाई भीड़

राजस्थान में जन आक्रोश यात्रा के शुभारंभ के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा जयपुर में थे। उनकी सभा में बमुश्किल हजार पंद्रह सौ लोग थे। जबकि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया खुद जयपुर जिले की आमेर विधानसभा से विधायक है और मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी हैं। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते उनका प्रदेश में बड़ा नेटवर्क माना जाता है। बावजूद इसके सभा में भीड़ नहीं थी। वरिष्ठ पत्रकार नीलम मुंजाल कहती हैं कि जन आक्रोश रैली को लेकर जेपी नड्डा की सभा में जो कमजोर रिस्पॉन्स आया है, उसके बाद भाजपा की राजस्थान इकाई को फिर से मंथन करना पड़ेगा। अगर भाजपा नेता वापस सत्ता में आना चाहते हैं तो उन्हें जनता से जुड़ना पड़ेगा। जन आक्रोश रैली को लेकर भाजपा बड़े जोर शोर से तैयारी कर रही थी। केंद्रीय नेतृत्व को पूरी उम्मीद थी कि इस यात्रा से राजस्थान में भाजपा को जोरदार रिस्पॉन्स मिलेगा। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष की सभा में भीड़ नहीं जुटने से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व निराश है। पार्टी को एकजुटता के साथ फिर से मंथन करने की जरूरत है।

राजस्थान भाजपा में है गुटबाजी

राजस्थान भाजपा में है गुटबाजी

पार्टी में मुख्यमंत्री पद को लेकर भारी गुटबाजी है। कई मौकों पर यह गुटबाजी सामने आ जाती है। ऐसा ही जन आक्रोश यात्रा के शुभारंभ पर हुआ। पार्टी के नेता और पदाधिकारी कार्यक्रम में तो पहुंचे। लेकिन वे भीड़ नहीं जुटा पाए। ऐसे में सभा के दौरान बहुत कम संख्या में कार्यकर्ता मौजूद थे। इससे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा नाराज होकर जयपुर से निकले हैं।

सिरोही में भीड़ नहीं जुटने से नाराज हुए थे पीएम मोदी

सिरोही में भीड़ नहीं जुटने से नाराज हुए थे पीएम मोदी

दो महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकास कार्यों का शिलान्यास करने के लिए सिरोही जिले के आबूरोड आए थे। यहां पर पीएम मोदी की जनसभा का भी आयोजन किया गया था। लेकिन उनकी सभा में भीड़ नहीं आने पर पीएम मोदी ने नाराजगी जताई थी। मोदी बगैर लोगों को संबोधित किए ही वहां से चले गए।

पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी जिम्मेदार

पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी जिम्मेदार

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व राजस्थान में गुटबाजी के लिए जिम्मेदार है। पार्टी प्रदेश में इस बार पीएम मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ना चाहती है। इसके चलते उन्होंने अभी किसी भी नेता को पार्टी का मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाया है। इससे पार्टी के भीतर गुटबाजी पनप रही है। प्रदेश के नेता नकारात्मक परिणामों के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं। जिससे राजस्थान में पार्टी कमजोर हो रही है। राजनीति के जानकार लोगों की माने तो जयपुर की सभा के लिए संगठन से जुड़े लोग गुटबाजी को जिम्मेदार बता रहे हैं। नीलम मुंजाल कहती हैं कि जन आक्रोश रैली के जरिए भाजपा राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को काउंटर करना चाहती थी। लेकिन जेपी नड्डा की सभा के बाद शीर्ष नेतृत्व निराश हुआ है। अब यात्रा के परिणामों को लेकर संशय की स्थिति है। पार्टी के राजस्थान में चेहरा घोषित नहीं किए जाने से पार्टी के कार्यकर्ताओं में उतना उत्साह नहीं रहेगा। वे बताती है इसका असर पार्टी की परफॉर्मेंस पर पड़ेगा। राजस्थान में पार्टी उतना जनाधार नहीं रख पाएगी। ना ही पार्टी नेताओं को एकजुट रख पाएगी।

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