Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

कभी देखा है आत्मा का घर? जानिए कहां बनाया जाता है इसे

जगदलपुर, 28 सितंबर। मौत के बाद आत्मा शरीर छोड़ देती है। शरीर का तो अंतिम संस्कार जाता है,लेकिन यह सवाल आज भी कायम है कि आत्मा कहां जाती है। प्राचीन मानव सभ्यता में हर बात का ख्याल रखा गया है। दुनियाभर में आज भी हज़ारों से सालों से चली आ रही संस्कृति को आदिवासी समाज के लोगों ने जीवित रखा है।आपको यह जानकर अचरज होगा कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासी बस्तियों में मृत हो चुके परिजनों की आत्मा को भी घर दिए जाने की परम्परा निभाई जाती है। आइये इसके बारे में जानते हैं।

ताजमहल तो नहीं,लेकिन भाव उससे कमतर नहीं

ताजमहल तो नहीं,लेकिन भाव उससे कमतर नहीं

अपने यह जरूर सुना होगा कि शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज की याद में ताजमहल का निर्माण करवाया था,लेकिन क्या आपने सुना है कि किसी ने मर चुके परिजन की आत्मा के निवास के लिए अलग से घर बनवाया हो।चाहें तो आप छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जाकर वहां के गावों में आत्माओं का घर देख सकते हैं।गोंडी भाषा में एक शब्द है " आना कुड़मा" जिसका मतलब होता है आत्मा का घर। मान्यता है कि इन्ही स्थानों में आदिवासियों के पूर्वज यानी उनकी आत्मा निवास करती है।

आना कुड़मा में नहीं जा सकती महिलाएं

आना कुड़मा में नहीं जा सकती महिलाएं

घने जंगल में बसे अबूझमाड़ के गांवों में हांडियों के भीतर पूर्वजों की आत्माओं को रखा जाता है। वैसे छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में ऐसे कई स्थान हैं, जहां आदिवासियों की अनोखी मान्यताओं को देखा समझा जा सकता है। पूर्वजों यानि आत्माओं के लिए बनाये गए घरों में महिलाओं और लड़कियों का प्रवेश पूर्ण रूप से प्रतिबंधित होता है,लेकिन विवाह की रस्म अदायगी से पूर्व पूर्वजों का आशीर्वाद लेने वहां जाना जरुरी होता है। किसी शुभ कार्य के आयोजन से ौरव उसका निमंत्रण देकर आदिवासी समाज अपने पितृ देव का आशीर्वाद लेने " आना कुड़मा" में जरूर जाता है ।

नहीं मनाते पितृपक्ष , मानते है पूर्वज हमेशा साथ रहते हैं

नहीं मनाते पितृपक्ष , मानते है पूर्वज हमेशा साथ रहते हैं

बस्तर संभाग के नारायणपुर और बीजापुर जिले में आत्माओं के लिए तैयार किये जाने वाले घरों को देखा जा सकता है। आदिवासी नेता देवलाल दुग्गा का कहना है कि आदिवासी समाज में उनके पितृ देव को रक्षक माना जाता है। अगर पितृ देव यानि पूर्वजों का आशीर्वाद रहेगा ,तो जीवन में संकट टल जाते हैं और बुरी आत्माओं से रक्षा होती हैं। यही वजह है कि आदिवासी समाज अपने पूर्वजों को भी एक अलग मंदिर में स्थान देते हैं, जिसे "आना कुड़मा" का नाम दिया गया है। हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक आदिवासी पितर या पितृ पक्ष नहीं मानते है, लेकिन पूर्वजों की पूजा अपने रीति-रीवाज से करते हैं।

छोटे से कमरे में रहती हैं पूर्वजों की आत्माएं

छोटे से कमरे में रहती हैं पूर्वजों की आत्माएं

आदिवासियों के पूर्वजों के रहने के लिए बनाया गया "घर " एक छोटा सा कमरा होता है। जिसमें काफी मृदभांड रखी रहती हैं। इसमें ही आदिवासी समाज के पितृदेव का वास होता है।इसी तरह आदिवासी समाज में घरों में भी एक कमरा पूर्वजों का होता है। जानकार बताते हैं कि आत्माओं के घर के रख रखवा को लेकर आदिवासी बेहद सावधानी बरतते हैं।

 नहीं किया चढ़ावा अर्पित, आ सकती है विपत्ति

नहीं किया चढ़ावा अर्पित, आ सकती है विपत्ति

नई फसल आने पर उसे सबसे पहले पूर्वजों को ही चढ़ाया जाता है। बस्तर के आदिवासी मानते हैं कि उनके परदादा, दादा माता या पिता का जीव साक्षात उनके साथ उपस्थित रहता है ,इसलिए सालभर उनकी पूजा अर्चना की जाती है। मान्यता है कि किसी ने अगर नई फसल आने पर आना कुड़मा में चढ़ावा नहीं अर्पित किया उनके गांव में विपत्ति आ सकती है। अगर कोई विपदा आई, तो इससे बचने के लिए दोषी ग्रामीण अपनी गलती स्वीकार करके पूजा पाठ करता है।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+