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खुले आसमान के नीचे शिक्षा की रौशनी बिखेर रहा ये ‘चिराग’, लगती है घाट पर क्लास

जबलपुर, 05 सितंबर: वैसे दुनिया में मुफ्त में कई चीजें मिलती हैं और उसकी कद्र एक सीमित वक्त तक ही रहती हैं। आधुनिक बाजारवाद की दुनिया में कम ही लोग हैं, जिनके दिल में किसी का भविष्य संवारने का जुनून हो। टीचर्स डे पर आज वैसे ही व्यक्तिव की हम बात कर रहे हैं। मप्र के जबलपुर के रहने वाले पराग दीवान उन्ही में से हैं। जो नर्मदा घाट पर बेसहारा और गरीब तबके के बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। किसी नौकरी की तरह हर रोज वक्त पर उनकी क्लास लगती है। न सिर्फ वह बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते है, बल्कि उनके एडमिशन से लेकर पढ़ाई का पूरा खर्च भी उठा रहे है।

कौन है पराग दीवान?

कौन है पराग दीवान?

मप्र जबलपुर के रहने वाले पराग दीवान...जैसा नाम वैसा ही उनका काम और उनकी सोच। तीन भाइयों में दूसरे नंबर के पराग की तमन्ना सरकारी नौकरी करके बुलंदियों को छूने की थी। बारहवीं के बाद आईआईटी में सफलता न मिलने की वजह से उन्हें कॉमर्स सब्जेक्ट लेना पड़ा। NDA का रिटर्न एग्जाम भी निकाल लिया लेकिन आगे क्वालीफाई नहीं कर पाए। उसके बाद पराग ने एमसीए किया और आज उन्होंने टीचिंग को अपना प्रोफेशन बना लिया हैं।

मां की हसरत थी, कि गरीब बच्चों को पढ़ाओं

मां की हसरत थी, कि गरीब बच्चों को पढ़ाओं

पराग बताते है कि जब वह चौथी क्लास में थे, तब उनके पिता का निधन हो गया था। MPSRTC में वह एग्जीक्यूटिव इंजीनियर थे। पिता के निधन के बाद मां पर जिम्मेदारियां बढ़ गई। वह बच्चों को ड्राइंग सिखाती थी। वह नर्मदा भक्त भी थी, घाट पर जब वह बेसहारा बच्चों को फूल दिए बेचते, नाव चलाते देखती तो उनका दिल पसीज जाता था। पराग से वह अक्सर कहती थी कि तुम प्राइवेट कोचिंग के साथ ऐसे बच्चों को जरुर शिक्षित करों । 2016 में मां का भी निधन हो गया। जिसके बाद उन्होंने मां के सपने को साकार करने का बीड़ा उठाया।

हर रोज शाम को लगती है क्लास

हर रोज शाम को लगती है क्लास

पराग जबलपुर के नर्मदा तट ग्वारीघाट पर बच्चों की क्लास लगाते है। शुरुआत उन्होंने पांच बच्चों से की थी। आज करीब दो सौ बच्चे उनसे बेसिक शिक्षा ग्रहण कर रहे है। इसके एवज में वह किसी से एक रुपए भी नहीं लेते। चाहे मैथ्स हो, साइंस या फिर इंग्लिश, हिस्ट्री हर विषय की बारीकियों से बच्चों का बौद्धिक विकास हो रहा हैं। पराग के पढ़ाने का तरीका भी जुदा हैं। क्योकि उनकी क्लास में 4-5 साल के बच्चे से लेकर 15-16 साल तक के स्टूडेंट सारे काम छोड़कर पढ़ने आते है। जो कोई भी पराग की इस पाठशाला को देखता है, वह ठिठक कर वहां रुकने मजबूर हो जाता हैं।

पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते है पराग

पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते है पराग

पराग की टीचिंग सिर्फ खानापूर्ति नहीं होती। बच्चे पढ़ना चाहते है, लेकिन उनकी ऐसी स्थिति नहीं कि किसी स्कूल में एडमिशन करा सकें। एडमिशन हो भी जाए तो किताब, कॉपी से लेकर ड्रेस खरीदने का इंतजाम नहीं रहता। फीस भरने पैसे नहीं रहते। लिहाजा नर्मदा घाट पर लगने वाली इस क्लास में शामिल बच्चों के हर तरह का खर्च का जिम्मा पराग ही उठाते हैं। उन्होंने अधिकांश बच्चों का सरकारी स्कूल में तो कई बच्चों का प्राइवेट स्कूलों में भी एडमिशन कराया हैं। साथ ही स्कूल में गार्जियन के रूप में उन्होंने खुद अपना नाम दर्ज कराया हैं। पैरेंट्स टीचर मीटिंग में वही स्कूल जाते हैं।

पढ़ाई करने वाले दो बच्चों को मिली नौकरी

पढ़ाई करने वाले दो बच्चों को मिली नौकरी

ख़ास बात यह है कि निर्धन बच्चों में शिक्षा की अलख जगाने वाले पराग की मेहनत रंग ला रही हैं। उनके पास पढ़ने वाले दो बच्चों का जम्मू एंड कश्मीर राइफल में सिलेक्शन भी हुआ। कई स्टूडेंट प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहे हैं। पराग का सपना है कि उनके पास पढ़ने वाले ये बच्चे राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाए। कोई सरकारी नौकरी में बड़े पदों पर भी आसीन हो, यही उनकी मां के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

पराग पर बन रही ‘शिक्षा घाट’ फिल्म

पराग पर बन रही ‘शिक्षा घाट’ फिल्म

निशुल्क शिक्षा के जरिए गरीब बच्चों का भविष्य संवार रहे पराग दीवान पर 'शिक्षा घाट' फिल्म भी जल्द आएगी। इसकी शूटिंग नर्मदा घाट पर हो चुकी है। फिफ्टी फ्रेम्स प्रोडक्शन हॉउस द्वारा इस फिल्म का निर्माण किया जा रहा है। जिसमें मुख्य किरदार के रूप में पराग ही नजर आएंगे।

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