Tomato farming: ‘टमाटर भाव से अब किसान हो रहे लाल’, लागत तो दूर तुड़वाई का भी नहीं निकल रहा पैसा
बढती ठण्ड के बीच टमाटर के रेट ने किसानों की टेंशन का पारा बढ़ा दिया है। खासतौर पर एमपी के महाकौशल अंचल के टमाटर उत्पादक किसानों का दर्द बाहर आना शुरू हो गया है। छिंदवाड़ा, सिवनी जिलों के कई इलाकों में बड़ी तादात में लोकल टमाटर की पैदावार हैं। डिमांड भी रहती है। लेकिन इस बार उत्पादन की लागत तो छोड़ों टमाटर की तुड़ाई का खर्च तक नहीं निकल पा रहा।

महंगाई के मुद्दे पर देश में जब भी हल्ला मचता है और रसोई की याद आती है, तो सब्जियों में टमाटर या फिर प्याज टारगेट होती है। इसकी कीमती में होने वाला उछाल मुद्दे को और गर्म कर देते है। लेकिन बढ़ती ठंड के मौसम में इस बार मप्र के कई इलाकों में टमाटर के दामों को लेकर आम लोग नहीं बल्कि उत्पादन करने वाले किसान परेशान है। महाकौशल अंचल में छिंदवाड़ा, सिवनी जैसे जिले में इसका उत्पादन होता है। यहां के टमाटर उत्पादक किसानों का कहना है कि उनकी उत्पादन लागत के हिसाब से बाजार में सही दाम नहीं मिल रहा।

आलम यह है कि कर्ज लेकर टमाटर की खेती करने वाले किसान और कर्ज में डूबते जा रहे है। सिवनी जिले के किसान हरिशंकर बताते है कि इस बार थोक बाजार में टमाटर के दाम काफी गिर गए है। मंडियों से जो सौदा होता था, रेट कम होने के कारण न तो उत्पादन की लागत निकल पा रही है और न ही खेत से टमाटर की तुड़ाई का खर्च। हिसाब-किताब करने बैठों तो लगता है कि टमाटर खेत से तुड़वाने से बेहतर फसले लगी ही रहे। छिंदवाड़ा जिले के उमरेठ तहसील में भी यही आलम है। 25 सालों से सब्जियों की खेती करने वाले मुईन खान ने इस बार 5 एकड़ में टमाटर की फसल बोई थी। लेकिन लागत और अन्य खर्च जोड़ने के बाद बाजार में टमाटर बिक्री का हिसाब आधे से भी कम है। इसलिए उन्होंने फसल जस की तस छोड़ दी। किसानों का कहना है कि यदि सरकार ने उनके हित में कोई फैसला नहीं लिया, तो सब्जियों की खेती हमेशा के लिए बंद कर देंगे।












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