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MP assembly election 2023: जबलपुर की सिहोरा विधानसभा सभा, जिला बनाने की डिमांड और चुनौतियों से भरी राह

MP assembly election 2023: सिहोरा विधानसभा सीट विशुद्ध ग्रामीण सीट है, साल 2006 में हुए परिसीमन में इसे अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित कर दिया गया। परिसीमन से पूर्व में इस सीट पर बीजेपी से प्रभात पांडे का वर्चस्व हुआ करता था।

सिहोरा विधानसभा सीट हिंदू और आदिवासी बहुल सीट है। आंशिक मात्रा में मुस्लिम, जैन और ईसाई समुदाय भी यहां निवास करता है। हिंदुओं मतदाताओं का प्रतिशत सबसे ज्यादा हैं। यहां ओबीसी पटेल मतदाताओं का बड़ा वर्ग हैं।

MP-assembly-election-2023-jabalpur-Sihora-Constituency

जीत-हार के गणित में आदिवासी वोटर्स का तबका भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता आया हैं। काफी संख्या में दलित मतदाताओं की भी उपस्थिति है। हालांकि सिहोरा उपनगर में ब्राम्हण और सवर्ण मतदाता बड़ी संख्या में निवास करते हैं। यहां के वोटर्स का मूड अलग ही तरह का रहा हैं। क्षेत्रीयता आधारित मुद्दों पर यहां की जनता उम्मीदवार को भांपते रहे फिर जनादेश भी देते रहे हैं। इस बार यहां 'सिहोरा को जिला बनाने' का मुद्दा बेहद गर्म हैं।

जबलपुर सिहोरा विधानसभा ( लगभग मतदाताओं की संख्या )
महिला पुरुष कुल
105717 109658 215385

सिहोरा विधानसभा क्षेत्र में आमदनी का प्रमुख स्त्रोत कृषि ही है। क्षेत्र में खनिज में बॉक्साइड की खदानें मौजूद हैं। कुछ मझौले उद्योग भी यहां स्थापित हैं। हालांकि प्रमुख रूप से कृषि ही यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। विधानसभा क्षेत्र में विकास, मूलभूत सुविधाएं जैसे सड़क,बिजली और पानी, शिक्षा में खासकर उच्च शिक्षा, बेरोजगारी और जिला बनाने की मांग प्रमुख है।

मतदान प्रतिशत (लगभग)
सबसे कम सबसे ज्यादा
1990 में लगभग 51% 2018 में सर्वाधिक 76 %

इस विधानसभा में पहले कांग्रेस का एकाधिकार रहा। भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद साल यहां प्रभात पांडे बड़े बब्बू कद्दावर नेता के रूप में उभरे। हालांकि साल 1998 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस के नित्यनिरंजन खंपरिया ने शिकस्त दे दी। साल 2003 में एक बार फिर प्रभात पांडे ने इस सीट पर कब्जा किया। वर्तमान में नंदनी मरावी यहां से 3 बार से विधायक चुनी जा रही हैं। सिहोरा विधानसभा सीट में खास पहचान के रूप में सिहोरा के पर्वत पर स्थित देवी का मंदिर है। यह प्राचीन मंदिर क्षेत्रवासियों के लिए श्रद्धा का केंद्र है।

इस विधानसभा क्षेत्र का मिजाज मिला जुला रहा है। वर्तमान में यहां के लोग सिहोरा को जिला बनाने की मांग जोर-शोर से उठा रहे हैं। इस मुद्दे को छोड़ दिया जाए तो लंबे समय से यहां बीजेपी को टक्कर मिलती दिखाई नहीं देती। वहीं कांग्रेस के पास विधायक नंदनी मरावी जैसा कोई आदिवासी चेहरा भी नहीं है। सिहोरा में सबसे बड़ी चुनावी उठापटक के रूप में साल 1998 का चुनाव ही जाना जाता है। यहां के वर्तमान विधायक प्रभात पांडे कद्दावर नेता थे, उनकी क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में अच्छी पैठ भी थी, लेकिन 1998 में कांग्रेस के नित्यनिरंजन खंपरिया ने उनकी नाक के नीचे से यह सीट निकाल ली और विधायक निर्वाचित हुए थे।

चुनाव वर्ष भाजपा कांग्रेस जीतने वाली पार्टी
2003 दिलीप दुबे नित्यनिरंजन खम्परिया BJP
2008 नंदिनी मरावी मुन्ना सिंह मरावी BJP
2013 नंदिनी मरावी जमुना मरावी BJP
2018 नंदिनी मरावी खिलाड़ी सिंह आर्मो BJP

किस चेहरे की चाहत?

पिछले चुनाव में दो बार की विधायक नंदिनी मरावी के सामने खिलाड़ी सिंह के रूप में एक अच्छा उम्मीदवार मैदान में उतारा था। लेकिन चुनाव परिणाम में नंदिनी मरावी एकतरफा जीत गई थीं। उन्हें प्रदेश सरकार की अनेक योजनाओं ने भी काफी मदद की थी। बीजेपी की बात की जाए तो इस सीट पर नंदिनी मरावी लगातार अच्छा करती चली आई हैं। लिहाजा वे प्रमुख दावेदार हैं। पार्टी यहां से किसी नए चेहरे को भी मौका दे सकती है। कांग्रेस की बात की जाए तो पिछले चुनाव में उम्मीदवार बनाए गए खिलाड़ी सिंह आर्मो प्रमुख दावेदार हैं। वहीं पूर्व में चुनाव मैदान में किस्मत आजमा चुकी जमुना मरावी भी दावेदारी पेश कर सकती हैं।

2003 से ही BJP का कब्जा

सिहोरा विधानसभा में चुनावी उठापटक को परिसीमन ने काफी ज्यादा प्रभावित किया। सिहोरा जो कभी प्रभात पांडे बब्बू की सीट हुआ करती थी। साल 2003 में पिछला चुनाव हारने की वजह से उनकी जगह दिलीप दुबे को बीजेपी ने मौका दिया था, वहीं कांग्रेस की ओर से नित्यनिरंजन खंपरिया जाना-माना नाम थे। वे 1998 में विधायक भी निर्वाचित हुए थे। साल 2006 में परिसीमन लागू होता है और ब्राम्हण समाज के सभी बड़े नेता एक प्रकार से घर बैठा दिए जाते हैं। उनका पूरा करियर ही धरा का धरा रह गया।

जब खिलाड़ी का फेल हुआ खेल
सिहोरा विधानसभा क्षेत्र में जनता के बीच साल 2018 में चर्चा थी कि कांग्रेस प्रत्याशी खिलाड़ी सिंह आर्मो चुनाव जीत जाऐंगे। लेकिन चुनाव परिणाम में नंदनी मरावी कुछ हजार मतों से जीत गईं। मतगणना के आंकड़ों का परीक्षण करने पर पता चला कि सिहोरा,मझगवां, गोसलपुर क्षेत्र से खिलाड़ी सिंह आर्मो पिछड़े थे। दरअसल इस इलाके में ब्राम्हण वर्ग का प्रभाव है। जो कि बीजेपी का वोट बैंक था। एक मतदान केंद्र 274 में खिलाड़ी को महज 98 वोट मिले। दरअसल खिलाड़ी सिंह को बीजेपी से कांग्रेस की सदस्यता दिलाकर टिकट दिया गया था। उन्हें गौड़ होने के चलते भी वरीयता दी गई थी लेकिन कांग्रेस का गणित बीजेपी के कोर वोटर्स के आगे फेल हो गया।

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